“माँ–पिता: त्याग, संघर्ष और अमिट स्मृतियों की अमूल्य विरासत”
यशवन्त कोठारी, जयपुर
सारांश:
यह दोनों कविताएँ माँ और पिता के संघर्ष, त्याग, करुणा और विरासत की भावनात्मक स्मृतियाँ हैं। एक ओर माँ का जीवनभर का निस्वार्थ तप और अपनों के लिए चिंता है, वहीं दूसरी ओर पिता का मौन संघर्ष, विरासत और आशीर्वाद का सहारा है। कवि की संवेदनाएँ पाठक को आत्मीयता, पीड़ा और कृतज्ञता के भाव से भर देती हैं।
माँ
चली गई माँअकेली दुखी
मगर पांच पूतों वाली
खूब किया संघर्ष जीवन भर
बेटो के लिए
बेटियों के लिए
पोतो-पोतियों के लिए
दोहितो-दोहितियों के लिए
हर क्षण चिन्तित थी
सभी के लिए
मगर कोई भी चिन्तित नहीं था
मां के लिए
अकेली उदास मां चली गई
बिना किसी की सेवा लिए
नहीं खाई कभी किसी के हाथ की
बनी रोटी
नहीं पिया किसी के हाथ से एक
गिलास पानी
बस निराहार करती रहीं
धार्मिक तपस्या परोपकार
कुछ नहीं मांगा कभी
अपने लिए।
हर क्षण चिन्ता बस दूसरों की
अपनों की परायों की
कहीं दूर किसी की मृत्यु पर
करती रहती संवेदना, मन ही मन
करती रहती चिन्ता
या सब के सुख की कामना
एक उदास सांझ की तरह चली गई
मां हमेशा के लिए।
पांच पूतों वाली मां ने कभी नहीं मांगा
सुख।
बस सुहागन विदा हो गई।
सब कुछ किया बेटों के लिए
खूब लड़ी बेटियों के सुख के लिए
नहीं मांगी किसी से मदद
बस चली गई हमेशा के लिए।
मां चली गई उदास सांझ की तरह …….।
उदासी और अकेलापन थे माँ का सहारा
या थी पुरानी यादे
उसके पुराने संदूकों में थें हमारे बचपन के फोटो
या फटे पुराने चिथड़े या फिर थे
यादों के झरोखे।
भावनाओं के सहारे मां काटती रहीं
अपने दुख के दिन।
नहीं मांगी कभी किसी से कोई मदद
धर्म तपस्या के सहारे
कट गई मां की जिन्दगी
बेटों के लिए पिता से लड़ती रहीं
हम पांच बेटे कुछ भी नहीं कर सके
मां के लिए।
मां तो बस मां थी
और कुछ नहीं
मां ने चलाना सिखाया
मां ने संघर्ष सिखाया
मां ने लिखना सिखाया
मां ने दुनियादारी सिखाई।
मगर बेटे सीख सीख कर
उड़ गये बना लिए उन्होंने नये नये घोंसले
भूल गये मां के घोंसले को
आंचल के गरम अहसास को
चले गये परदेस
मगर मां ने हार नहीं मानी
करती रही चिन्ता बेटों पोतो की।
आंसू ढलकाती रही बस …..।
मां ने क्या कुछ नहीं किया
सभी के लिए
मगर
किसी से कुछ नहीं मांगा मां ने।
मां के चले जाने पर दुखी है सब
हस सब मां को याद कर बहुत रोते हैं।
मगर मां का क्या वो तो
मोक्ष पा गई।
मृत्यु का अहसास था मां को
उसने पोतियों को दे दिया सब कुछ।
मां चली गई हमेशा हमेशा के लिए
और शायद वहां से भी हम सब
के लिए सुख मांग रही हैं।
मां इस तरह क्यों चली गई
कुछ तो अवसर छोडती।
मातृ ऋण से कैसे होगे हम
उऋण?
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पिताजी
चले गये पिताजी भी
माताजी की राह पर
सौंप कर अपनी विरासत
मुकदमें लेनदारियां
देनदारियां
वकील फाइलें और घर बार
नहीं मिला उन्हें सन्तोष न्याय
छोड़ गये दुखों का एक जखीरा
सब के नाम।
सब के लिए।
मॉं के चले जाने के बाद
बहुत उदास थे पिता
लेकिन चुपचाप
रहते थे।
नहीं कहते थे किसी को भी कुछ
बस चुपचाप खो जाते
फाइलों कागजों में
उदासी के साथ ही चले गये पिता भी।
छोड़ गये।
भरापूरा परिवार।
धर्मग्रन्थ पुस्तकें और
सुखी भवितव्य हेतु
आर्शीवाद। आर्शीवाद।। आर्शीवाद।।।
बहुत सोचता हूँ
इस तरह क्यों हुआ।
अचानक चलते फिरते ही चले गये।
नहीं दी किसी को तकलीफ बस
चुपचाप … चुपचाप चले गये।
आज वे होते तो ये होता
ये होता तो वो होता
ऐसा कहते। वैसा कहते।
ऐसा करते। वैसा करते।
ऐसे समझाते। वैसे समझाते।
वे बरगद की ठण्ड़ी छांव थे।
वे नहीं हैं तो सब कुछ उदास है।
उदास छत उदास दीवारें घर नही होता
वे थे तो घर घर था।
अब कुछ भी नही
वे थे तो मिलने गांव जाते पूरे गांव से मिलते
गर्मियों में बच्चे दादा के पास ही रहते
अब गांव ही बेगाना हो गया।
पिता के सायें तले हम सब एक थे।
चलें गये वे मां से मिलने
हमेशा हमेशा के लिए
बहुत उदास है हम सब
मगर जीवन तो चलने का नाम
अनन्त यात्रा पर चले गये पिता भी।
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