प्रस्तुति : शिखा तैलंग, भोपाल
फैशन बदलता है लेकिन सलीका हमेशा असर छोड़ता है।
सारांश:
भारतीय समाज विविधताओं से भरा है — यहां संस्कृति, परंपराएं और रीति-रिवाज़ जैसे रंग-बिरंगे धागे एक गहरे सामाजिक वस्त्र को बुनते हैं। इस सामाजिक वस्त्र में “ड्रेस सेंस” यानि परिधान चयन का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। आइए विस्तार से जानते हैं भारतीय संदर्भ में मॉर्डन पर आदर्श ड्रेस सेंस के बारे में—
पहले जहां भारतीय परिधान ही जीवनशैली का हिस्सा थे, वहीं अब समय के साथ पश्चिमी परिधानों का प्रभाव भी बहुत गहराई से महसूस किया जा रहा है। पर सवाल यह है कि क्या हर ड्रेस हर व्यक्ति पर सूट करती है? क्या आधुनिकता के नाम पर हम अपने शारीरिक गठन, समय और अवसर की उपेक्षा कर देते हैं?
भारतीय परंपरा में वस्त्रों की भूमिका
भारत में वस्त्रों को केवल शरीर ढकने का साधन नहीं माना गया, बल्कि यह पहचान, मर्यादा और अवसर के प्रतीक रहे हैं। एक समय था जब महिलाएं साड़ियों, सलवार-कुर्तों और पुरुष धोती-कुर्ता या कुर्ता-पायजामा में सहज महसूस करते थे। इन परिधानों में न केवल पारंपरिक सुंदरता थी, बल्कि यह भारतीय मौसम और शरीर संरचना के अनुसार भी उपयुक्त थे।
बदलते समय के साथ ड्रेस सेंस में बदलाव
आधुनिकता और वैश्वीकरण के प्रभाव से भारतीय समाज में पहनावे को लेकर भी एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया है। विशेषकर शहरी क्षेत्रों में जीन्स-टॉप, शॉर्ट्स, स्कर्ट्स, टी-शर्ट, फॉर्मल सूट जैसे पश्चिमी परिधान आम हो गए हैं। युवा पीढ़ी इन्हें फैशन, स्वतंत्रता और आत्मविश्वास का प्रतीक मानती है।
हालांकि, यह बदलाव किसी हद तक स्वाभाविक भी है, क्योंकि समाज गतिशील होता है और समय के साथ चलता है। फिर भी यहां यह प्रश्न उठता है — क्या हम सिर्फ ट्रेंड को फॉलो करने के चक्कर में अपनी असलियत, परिस्थितियों और शरीर के अनुरूप वस्त्रों का चयन करना भूल गए हैं?
पश्चिमी पहनावे को लेकर दोहरी सोच
भारतीय समाज में आज भी पश्चिमी पहनावे को लेकर दोहरी मानसिकता देखने को मिलती है। एक ओर उच्च मध्यम वर्ग और युवा पीढ़ी इसे “प्रगतिशील सोच” से जोड़कर देखती है, तो दूसरी ओर छोटे कस्बों या पारंपरिक परिवारों में इसे “संस्कारों से भटकाव” माना जाता है। कई बार महिलाओं को छोटे कपड़े पहनने पर ताने सुनने पड़ते हैं — “आजकल की लड़कियां कुछ भी पहन लेती हैं”, या फिर “ये तो संस्कृति को बिगाड़ रही हैं।”
यह सोच यह दिखाती है कि ड्रेस सेंस को आज भी हम केवल फैशन या पश्चिमीकरण के चश्मे से देख रहे हैं, जबकि मूल सवाल यह होना चाहिए — “क्या यह वस्त्र व्यक्ति की देह संरचना, सामाजिक संदर्भ, मौसम और अवसर के अनुसार उपयुक्त है?”
ड्रेस सेंस: केवल फैशन नहीं, एक बुद्धिमानी है
ड्रेस सेंस का सीधा संबंध व्यक्ति की समझ, संतुलन और आत्मप्रस्तुति से होता है। एक ही ड्रेस किसी एक व्यक्ति पर सुंदर लग सकती है, जबकि दूसरे पर असंगत। इसके पीछे कारण होता है — शरीर की बनावट, रंग, व्यक्तित्व और आत्मविश्वास।
उदाहरण के लिए:
- अधिक वजन वाले व्यक्ति पर बहुत टाइट कपड़े असहज लग सकते हैं, जबकि हल्के फ्लोईक वस्त्र उनकी पर्सनैलिटी को उभार सकते हैं।
- एक औपचारिक मीटिंग में जीन्स और टी-शर्ट भले ही फैशन हो, पर यह प्रोफेशनल वातावरण में अनुपयुक्त लगेगा।
- मंदिर या पारिवारिक पूजा में मिनी स्कर्ट पहनना, भले ही फैशन हो, पर वह अवसर की गरिमा को ठेस पहुंचा सकता है।
मीडिया और सोशल मीडिया का प्रभाव
आजकल सोशल मीडिया पर तरह-तरह के फैशन ट्रेंड्स वायरल होते हैं। “बॉडी पॉज़िटिविटी” के नाम पर हर कोई हर प्रकार के कपड़े पहनने को प्रेरित किया जा रहा है। हालांकि आत्मस्वीकृति और आत्मविश्वास ज़रूरी है, लेकिन ड्रेस सेंस का अर्थ यह नहीं कि हम आंख बंद करके हर ट्रेंड को अपनाएं।
ड्रेस का चयन हमेशा सोच-समझकर करना चाहिए — कौन-सा अवसर है, कहां जा रहे हैं, किसके साथ जा रहे हैं, और क्या वह ड्रेस हमारी पर्सनालिटी को संवारता है या नहीं।
निष्कर्ष: सलीका ही असली स्टाइल है
कपड़े पहनना एक कला है — यह केवल शरीर नहीं, सोच को भी ढकते और दर्शाते हैं। इसलिए हमें किसी ड्रेस को केवल इस आधार पर नहीं चुनना चाहिए कि वह ट्रेंड में है या महंगे ब्रांड की है।
हर व्यक्ति को अपनी देह संरचना, रंग, उम्र, मौसम, अवसर और सामाजिक परिवेश के अनुसार ड्रेस का चयन करना चाहिए। यही “ड्रेस सेंस” की असली समझ है। जब व्यक्ति खुद को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करता है — चाहे वह साड़ी हो या जीन्स, कुर्ता हो या टक्सीडो — तब वह सबसे आकर्षक और प्रभावी दिखता है।
याद रखिए, फैशन बदलता है लेकिन सलीका हमेशा असर छोड़ता है। और सलीका वही है जो व्यक्ति, परिस्थिति और समय के अनुसार हो — न कम, न ज़्यादा।