“प्रकृति, प्रेम और पीड़ा – उत्तम की कविताओं में जीवन का हर रंग”
उत्तम कुमार तिवारी ” उत्तम “, लखनऊ
सारांश:
उत्तम कुमार तिवारी “उत्तम” की कविताएँ प्रकृति, प्रेम और वेदना का अनोखा संगम हैं।
कभी बारिश, घटाएँ और फूल प्रेम की यादें जगाती हैं, तो कभी कश्मीर की त्रासदी आत्मा को झकझोर देती है।
स्वेत चाँदनी और प्रकृति की छटा जीवन में आशा, सौंदर्य और मिलन का संदेश देती है।आइए दिल को छू लेने वाली इन रचनाओं को पढ़ें पूरे मनोयोग से—
बरसातों में
कोई इन बारिसो से कह दे अब बरसना बंद कर दे ।
ऐसी बरसातो मे हमको उनकी बहुत याद आती है ।।
ऐसे मौसम मे चमन खुशनुमा हो जाता है ।
फूलो की खुशबू से उनकी बहुत याद आती है ।।
खिली हुई कलियों की जब जब नज़ाकत देखता हूँ ।
उनके अलसाये बदन की अंगड़ाई बहुत याद आती है ।।
बरसात मे दरख्तों मे छिपे झींगुरो की जब आवाज सुनता हूँ ।
उनकी प्यार भरी मदहोश सिसकियों की बहुत याद आती है ।।
जब उछलते कूदते देखा हिरणी को बाग़ मे ।
उनकी बलखाती इठलाती चाल बहुत याद आती है ।।
कोई कह दे इन काली घटाओं से चले जाए अपने देश को ।
उनके कांधे पर बिखरी हुई ज़ुल्फे की बहुत याद आती है ।।
भीगे हुए बदन पर लिपटी हुई उनकी साड़ी जब जब भी देखता हूँ ।।
दरवाजे पर लगे पेड़ पर लिपटी हुई मार्निग ग्लोरी की बेल बहुत याद आती है ।।
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सिंदूर की सौगंध
खामोश थी हवाये
खामोश थी फिजाये ।
बस चित्कार उठ रही थी
रोती थी आत्माये ।।
कौन सा गुनाह था
जो हम यहां आ गये ।
अपना उजाड़ सिंदूर
अब घर को जा रहे ।।
अपनी खुशी को लेकर
निकले थे अपने घर से ।
बच्चों को यतीम करके
घाटी से जा रहे थे ।।
सोचा था स्वर्ग धरती का
कश्मीर देखना है ।
लाशे बिछी पड़ी थी
अब नर्क देखना है ।।
देकर श्राप तुमको
मै अब जा रही हूँ ।
तुम भी न बच सकोगे
सौगंध खा रही हूँ ।।
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चांदनी
स्वेत चादनी खिली हुई ”
सौम्य स्वेत चादनी खिली हुई
मंद सुगंध समीर झिली हुई ।
झींगुर की झन झन आवाज हुई
तन ओढे विभावरी खिली हुई ।।
मन मोह रही ये प्रकृति निराली
चहु ओर खिली है धरा निराली ।
प्रेम समर्पण करने को
रून झुन बोली पायल मतवाली ।।
मै बहक रहा था उसकी सासो मे
मै पिघल रहा था उसकी बाहो मे
तन मेरा शिथिल हुआ था
जब छोड़ा उसने बाहो से ।।
धीरे धीरे चाँद गया
लेकर स्वेत चांदनी को ।
धीरे धीरे रवि खोल रहा था
अपनी अलसाई आँखो को ।।
देखा सुन्दर धरती को
खिली खिली हरी भरी
जल किलोल सब मीन करे
चहु ओर कुमदनी खिली हुई ।।
जल तरंग से नदी भरी
लहरों मे जवानी आई है ।
दिन ढला फिर साझ हुई
रात मिलन को आई है ।।