सुशीला तिवारी, पश्चिम गांव, रायबरेली
हर सावन कुछ भूलता है, कुछ याद दिला जाता है…
सारांश:
पहली कविता एक ऐसे सावन की याद दिलाती है जो भावनाओं, प्रेम, और अधूरे सपनों से भरा हुआ था।
बीते पलों की कसक, आत्म-संवेदनाओं और जिम्मेदारियों की जंजीरों में जकड़ी ज़िंदगी को सावन की बूंदें फिर एक नई उम्मीद देती हैं। जबकि दूसरी कविता शब्दों में छिपे दर्द के बावजूद, एक कोमल विश्वास से भर देती है — “फिर से वैसा ही सावन आयेगा!” आइए विस्तार से पढें इन दो हृदयस्पर्शी कविताओं को—
एक सावन मुझे
भूलने को तो मैं भूल सब कुछ गया ,
याद आता रहा एक सावन मुझे ।
शबनमी बूँद से भीगती वो सुबह ,
एक कतरा मुझे आ के महका गया ,
इन्तजार – ए- मुहब्बत में तड़पा गया ,
अनमना पन मेरे दिल में भरता गया ,
देह को देह की कुछ कदर न हुई ,
फिर डराने लगा मेरा दामन मुझे ।
जितने देखे थे सपने सब नशीले रहे ,
भरम टूटा चलो ये भी अच्छा हुआ ,
एक नही सारे वादे अधूरे रहे उम्र भर ,
हमने सोंचा था कि प्यार सच्चा हुआ ,
धनक में भिगोया सपन का दुपट्टा ,
याद आता रहा वही रंग पावन मुझे ।
साथ छूटा चलो छुट गया क्या हुआ ,
ताने मिलने लगे बस इसी बात पर ,
उम्र भर ये कसक बस खटकती रही ,
हो सके न किसी के हम आज तक ,
मेरे आंगन मे खुशियों ने दस्तक न दी,
अब बदलना पड़ा घर का आंगन मुझे ।
सच रहा कल तलक वही सपना लगे,
हां “सुशीला” कोई अब न अपना लगे,
खुद को हमने न जाने कहां खो दिया,
रह गया याद खुद का समर्पण मुझे ।
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फिर से वैसा सावन आयेगा
पहले जब सावन आता था ,
हरियाली संग मस्ती लाता था ,
अब पहले सी बात नही है ,
कजरी में मनोहर राग नही है ,
जीवन क्या वो पल दोहरायेंगा ।
फिर से वैसा ही सावन आयेगा ।।
जब मन में जगी थी तरुणाई ,
और लेती थी उमंग ए अंगड़ाई ,
अच्छा लगता बदरी का छाना,
फिर सावन के मेघ बरस जाना,
सूखा मन फिर हरा हो पायेगा ।
फिर से वैसा ही सावन आयेगा ।।
अब सुप्त पड़ गये भाव सभी,
बन गये हैं मरहम घाव सभी,
और जंजीर बन गई जिम्मेदारी ,
पर सावन की हूँ मैं आभारी ,
वो अहसास सुखद दिलायेगा ।
फिर से वैसा ही सावन आयेगा ।।
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बहुत खूब