प्रस्तुति’ शिखा तैलंग, भोपाल
जब साथ हो सच्चा विश्वास, अंधेरे भी राह दे जाते हैं उजाले को।
सारांश:
शिवानी, एक मेधावी छात्रा, स्किज़ोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारी से जूझती है, जिसे समाज पागलपन समझता है।
राहुल और डॉक्टर सीमा की मदद से वह खुद से लड़ना और खुद को जीतना सीखती है।
कहानी अंधेरे से उजाले की यात्रा है, जिसमें प्रेम, सहानुभूति और समझदारी ही सबसे बड़ी दवा बनते हैं। आइए दिल को छू लेने वाली यह कहानी पढ़ें विस्तार से—
शिवानी, भोपाल के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में पढ़ने वाली होशियार और संवेदनशील लड़की थी। वह हर परीक्षा में टॉप करती, हर प्रोजेक्ट में तारीफें पाती, पर जब वो अकेली होती, तो कोई अदृश्य डर उसकी सांसें रोकने लगता।
एक दिन, देर रात वह अपनी खिड़की के पास बैठी थी। बाहर की हवा में कुछ अजीब सी सरसराहट थी। उसे लगा कि सामने की छत से कोई उसे घूर रहा है। डरते हुए उसने खिड़की बंद की और बिस्तर पर आकर कांपने लगी।
धीरे-धीरे उसकी दुनिया बदलने लगी—वो भीड़ में भी अकेली महसूस करती, कई बार खुद से बातें करती और अकसर ऐसा लगता कि कोई उसके पीछे-पीछे चल रहा है। ये सिर्फ डर नहीं था, ये एक मानसिक धुंध थी जो हर दिन घनी होती जा रही थी।
कॉलेज में उसका एकमात्र सच्चा दोस्त था—राहुल मिश्रा। इलाहाबाद से आया एक गंभीर लेकिन दयालु लड़का, जो मनोविज्ञान में एम.ए. कर रहा था। राहुल ने जल्दी ही महसूस किया कि शिवानी बदल रही है। उसकी आँखों में डर स्थायी हो गया था।
एक दिन क्लास के बीच में अचानक शिवानी चीख पड़ी—”वो आ रहा है! मुझे मार देगा!” पूरी क्लास सन्न रह गई। राहुल दौड़ा और उसे थाम लिया।
“शिवानी! कोई नहीं है यहाँ… देखो मेरी आँखों में… मैं हूं यहाँ।”
वो काँपती रही, फिर अचानक बेहोश हो गई। राहुल उसे तुरंत कॉलेज मेडिकल सेंटर ले गया और उसके माता-पिता को फोन किया।
राजेश जी और किरण जी जैसे ही हॉस्पिटल पहुंचे, उन्होंने गुस्से में राहुल को झिड़क दिया।
“आप होते कौन हैं हमारी बेटी को पागल कहने वाले?” राजेश जी गरजे।
“ये सब पढ़ाई का दबाव है, कल थोड़ा सोई नहीं होगी, बस!” किरण जी बोलीं।
डॉक्टर ने रिपोर्ट दिखाते हुए कहा, “इनकी बेटी स्किज़ोफ्रेनिया से पीड़ित है। यह एक गंभीर मानसिक स्थिति है—इलाज जरूरी है।”
लेकिन ‘पागल’ शब्द ने माता-पिता के अंदर बैठे समाज के डर को उकसा दिया। वे शिवानी को जबरन घर ले गए।
राहुल ने हार नहीं मानी। वह अपने प्रोफेसर डॉ. सीमा त्रिवेदी से मिला और शिवानी के माता-पिता को मिलने बुलवाया।
डॉ. सीमा ने बड़े प्यार से समझाया, “राजेश जी, यह रोग कोई चरित्र दोष नहीं है। जैसे मधुमेह या ब्लड प्रेशर का इलाज होता है, वैसे ही इसका भी होता है।”
किरण जी की आँखें भर आईं, “क्या हमसे कोई गलती हो गई?”
“गलती नहीं,” डॉक्टर बोलीं, “बस अब समझदारी की ज़रूरत है।”
इस बार, दोनों सिर झुका कर राज़ी हो गए।
इलाज शुरू हुआ। लेकिन ये राह आसान नहीं थी।
कभी शिवानी दवाएं लेने से इनकार कर देती, कभी वह राहुल पर चिल्ला पड़ती—”तुम भी मेरी जासूसी करते हो! मुझे अकेला छोड़ दो!”
राहुल चुपचाप बैठा रहता, फिर धीरे से कहता, “अगर अकेलापन ही हल होता, तो अब तक तुम ठीक हो चुकी होती। मैं तुम्हारे साथ हूं, शिवानी।”
कई रातें वह रोते-रोते सोई, कई बार खुद को चोट पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन हर बार राहुल, उसके माता-पिता और डॉक्टर सीमा ने मिलकर उसे थाम लिया।
समय के साथ दवाओं ने असर दिखाना शुरू किया। सबसे बड़ी बात, शिवानी अब खुद भी ठीक होना चाहती थी।
एक दिन बगीचे में बैठी वह राहुल से बोली, “तुम क्यों रुके मेरे लिए? इतनी मुश्किलों के बाद भी?”
राहुल ने मुस्कुरा कर कहा, “क्योंकि जब पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ थी, मुझे यकीन था कि एक दिन तुम खुद के लिए लड़ना सीखोगी। और शायद… क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूं।”
शिवानी की आंखें भर आईं, पर इस बार वो आँसू डर के नहीं, विश्वास के थे।
तीन साल बाद, शिवानी कॉलेज से ग्रेजुएट हो चुकी थी। साथ ही उसने एक काउंसलिंग कोर्स भी पूरा किया था।
अब वह दूसरों की मदद करती थी—उन लोगों की, जो उन्हीं अंधेरे गलियों में भटक रहे थे जहां वह कभी थी।
राहुल ने एक दिन सबके सामने, नर्मदा के किनारे, अपने घुटनों पर बैठकर प्रपोज़ किया।
“शिवानी, क्या तुम मेरी जिंदगी में हमेशा के लिए रोशनी बनोगी?”
शिवानी ने मुस्कराते हुए हाथ आगे बढ़ाया, “अगर तुम साथ हो, तो मैं फिर कभी अंधेरे से नहीं डरूंगी।”
आज, दिल्ली में रहने वाले शिवानी और राहुल एक NGO चलाते हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य पर काम करता है। शिवानी कहती है—
“अंधेरा चाहे जितना भी घना हो, अगर कोई तुम्हारा हाथ थामे रहे, तो उजाला रास्ता बना ही लेता है।”
(काल्पनिक रचना)
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Bahut khub!