सुनीता मिश्रा, देहरादून
कभी-कभी एक साधारण यात्रा भी ईश्वर की परीक्षा बन जाती है!
सारांश:
शादी की सालगिरह पर अयोध्या पहुंचे दंपती को रामलला दर्शन के बाद एक अद्भुत अनुभव हुआ, जब दो रहस्यमयी साधु भोजन मांगते हुए उनके जीवन में आए। साधुओं की शर्तें, उनके साथ की गई पूरी यात्रा और अंत में उनका चित्र तक गायब हो जाना – ये सब किसी ईश्वरीय लीला से कम नहीं लगा। यह घटना उनके लिए आस्था, विश्वास और सकारात्मक सोच की परीक्षा बन गई, जिसने उन्हें जीवनभर की सबसे खूबसूरत यादें दे दीं। आइए जानें इस दिलचस्प और रहस्यमय अनुभव को विस्तार से—
6 मई 2024 को हम अयोध्या दर्शन के लिए गए थे। क्योंकि हमारी शादी की सालगिरह थी अतः मैंने ओर मेरे पति प्रमोद जी ने अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करने का मन बनाया। सुबह करीब 10:00 बजे हम होटल के कमरे में जाकर स्नान, करने के बाद दर्शन के लिए निकल गए।
एक लंबी लाइन का सामना करते हुए हम लोगों ने आखिरकार “रामलला ” के दर्शन कर लिए। उसके बाद आसपास के सारे मंदिरों में घूमते-घूमते हम थक कर चूर हो गए थें, किंतु इसी दो दिन में हमें सारे मंदिरों के दर्शन करने थें; अतः हम करीब रात के 9:00 बजे तक बाकी सभी मंदिरों के दर्शन करते-करते आखिर में हनुमानगढ़ी में हनुमान जी के दर्शन के लिए आ पहुंचे थें।
हम पति पत्नी सीढ़ियों के नीचे ही खड़े उस भीड़ को देखकर हद से ज्यादा भयभीत हो रहे थें, और मैं इतनी थकी हुई थी कि मेरी हिम्मत नहीं हुई उस भीड़ को चीरते हुए दर्शन करने के लिए जाने की। हम समझ नहीं पा रहे थे आखिर करें तो क्या करें!
आगे दो कदम चलने की भी मुझ में हिम्मत नहीं थी किंतु बस या ऑटो लेने के लिए भी हमें बहुत दूर तक अभी चलना बाकी था।
हम दोनों थके-हारे, आंखों से एक- टक भीड़ को निहारें जा रहे थें, और कल दर्शन करेंगे यही सोचकर वापस होटल जाने की सोच रहे थें। तभी प्रमोद जी को पीछे से किसी ने हाथ पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया।
“जी बोलिए!!?” प्रमोद जी घूमते हुए बोले।
“हमें भोजन करा दोगे क्या ?” सामने एक करीब 7 फुट का लंबा चौड़ा और बेहद खूबसूरत इंसान लाल अंगोछा गेरुआ कुर्ता और गेरुआ रंग का धोती पहने हुए इंसान सामने से पूछ रहे थें । मैं भी तब तक मुड़ कर देखने लगी थीं ।
एक अजीब सी आभा और तेज उस इंसान के चेहरे पर थी। एक अलग किस्म का आकर्षण जिसे मेरा मन मस्तिष्क आज तक नहीं भूला पाया है।
“हां-हां क्यों नहीं चलिए कहां खाना है!!?” प्रमोद जी सामने वाले इंसान के मुख से शब्द पूरा होने के पहले ही बोल पड़ें।
फिर मेरी तरफ देखते हुए बोले “क्यों ठीक है ना?”
“जी बिल्कुल चलिए किसी रेस्टोरेंट में और इन्हें खिला दीजिए!”मैं एक पल गंवाए बगैर ही बोल पड़ी थी । मैं उस व्यक्ति के तेजस्वी व्यक्तित्व को देख कर मंत्र-मुग्ध हो गई थी।
आपको अगर कोई रेस्टोरेंट के बारे में पता हो तो चलिए? प्रमोद जी ने सहज ढंग से उस व्यक्ति से कहां।
और फिर उन्होंने हां में सिर हिलाते हुए मंदिर से कुछ दूर पीछे के गलियों में प्रवेश करते बने। हम पति पत्नी उनके साथ चलने लगे। किंतु वहां जाने पर पता चला वह रेस्टोरेंट उस दिन बंद था।
हम तीनों फिर हनुमानगढ़ी मंदिर के पास वापस आए और फिर वहां से साधु महाराज आगे की तरफ बढ़ते गए। मेरे पति उनके साथ और मैं हद से ज्यादा थकी होने के कारण धीरे-धीरे उनके पीछे-पीछे चली जा रही थी।
वहां से करीब आधा किलोमीटर आगे बढ़ने के बाद एक दूसरी गली में एक रेस्टोरेंट के पास हम सब जाकर खड़े हो गए इसी बीच साधु महाराज के साथ एक और साधु जुड़ गए थें , जो साधु महाराज के मित्र थें।
यह छोटे कद के और राम लला के ही रंग के थें। मैं ठीक से उनका चेहरा नहीं देख पाई थीं। एक हल्की नजर ही मैं देख पाई थी क्योंकि वह आगे थें और मैं उन लोगों से बहुत पीछे थी।
किंतु वहां जाने के बाद छोटे कद के साधु ने वहां खाने से इनकार कर दिया। बोले लहसुन प्याज बनता हैं यहां। मैं थोड़ी पीछे थी उन लोगों को वापस आता देख मैंने अपने पति से आंखों से ही प्रश्न किया।
मुझे डर था कहीं मेरे पतिदेव थके हारे होने के कारण गुस्सा ना हो जाए। किंतु उन्होंने बड़ी विनम्रता के साथ उनके साथ और आगे बढ़ते चले गए। हम सब आखिरकार एक बहुत बढ़िया रेस्टोरेंट के सामने खड़े थें।
मैंने इत्मीनान की सांस लेकर रेस्टोरेंट के अंदर चलने का इशारा किया। अब एक कदम भी चल पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था।
हमने सोच लिया कि हम भी यहीं पर खाना खा लेंगे ताकि होटल में जाकर खाना ना पड़ें।
तभी पति के साथ उन दोनों साधुओं को वापस लौटते हुए देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गई।
क्रमश:
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हमने भी पिछले साल यानी २०२४ में अयोध्या दर्शन किया था। सरयू की आरती भी हम अनुभव कर पाए थे और हनुमान जी के दर्शन भी अच्छे से हुए। राम लला के दर्शन के लिए वृद्धों के लिए अच्छी सुविधा भी है हमने मम्मी के लिए उसका उपयोग किया था तो मेरे दर्शन भी जल्दी हो गए थे। फिर हम भी रेस्टोरेंट में खाना खाकर गोरखपुर के लिए निकल गए।