“उत्तम की कविताएँ – जीवन, संगीत और ऋतुओं का सुरम्य संगम”
उत्तम कुमार तिवारी ” उत्तम ” , लखनऊ
सारांश:
उत्तम कुमार तिवारी “उत्तम” की कविताएँ जीवन की मासूमियत, साहित्य का रस और सावन की भीनी महक को शब्दों में पिरोती हैं। इनमें बस्तियों की चहल-पहल, गीतों का मधुर प्रवाह और ऋतुओं की भावनात्मक छुअन मिलती है।
पाठक इन कविताओं को पढ़कर भाव, रस और संस्कृति की आत्मीयता महसूस करते हैं। आइए मोती जैसे शब्दों से सजी इन रचनाओं का आनंद लें—
नज़ारा
ये शरारते ये बस्तिया
ये खेलती है बच्चिया ।
ये शाम कितनी है सुहानी
बोलती है बस्तिया ।।
शाम होते जल पड़ी
हर घरों की बत्तियाँ ।
बज उठी मंदिरो मे
शाम को ये घंटिया ।।
आरती होने लगी
तालिया बजने लगी ।
मस्जिदों की अजाना
कान मे आने लगी ।।
चाट ठेले लग गये
चाट भी बिकने लगी ।
गोल गप्पे खा रही
मेरे घरों की बच्चिया ।।
क्या सुहानी शाम है
पार्क सारे जाम है
तितलियों सी लग रही
मेरे शहर की बच्चियां ।।
खेल कूद कर रही
पार्क मे उछल रही
स्कूल सारे बंद है
चल रही है छुट्टिया ।।
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गीत
हमे अभी साहित्य मे बहने दो
अपनी रचनाये लिखने दो ।
शब्द प्रवाह हो निर्मल मेरा
ऐसे शब्दों को लिखने दो ।
शब्द मेरे जब बोल उठे
तब वाद्य यंत्र सब बोल उठे ।
ऐसे गीतो को लिखने दो
श्रोता सुन कर झूम उठे ।।
शब्द शब्द पर बजे तालिया
न स्वर कर्कश न मिले गालिया
संगीतमय हो गीत मेरा
ऐसे गीतो को लिखने दो ।।
ओज लिखूं या शोक लिखूं
हर विधा के भाव लिखूं
प्रेम लिखूं या श्रृंगार लिखूं
माँ की ममता के शब्द लिखू
मुझे गीत अब लिखने दो
झरनों के गीत सुनाने दो ।
कल कल करती नदियों को
सुन्दर गीत मे लिखने दो ।।
वेणी सुलझती नथ को पहने
चूड़ी की खन खन लिखने दो ।
श्रृंगार करूँ मै गीतों से
ऐसे गीतों को लिखने दो ।।
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सावन
हौले हौले सावन आया
मेरा मन बहलाने को
धीरे से वो बरस गया
मेरे घर के आँगन मे ।।
छिन छिन बदरी छिन बरसा
कही झमाझम कही पर रिमझिम
कही फुहार से फुफुक रहे
बरस रहे है कारे बदरा ।।
लदी डाल काले जामुन से
आम बाग़ मे महक रहे
घर घर झूला झूल रही है
बिटिया सब घर आँगन मे ।।
कही पे सोहर कही पे सावन
कही पे कजरी गाती है ।
जिनके पिया प्रदेश बसे
उनकी छाती जर जाती है ।।
वारे सावन तू मन भावन
सदा हरा भरा सा रहता है ।
मेरे पिया से जाकर कहना
तड़फ रही हूँ आँगन मे ।।