शबनम मेहरोत्रा. कानपुर
चाहतें उम्र की मोहताज नहीं होतीं, पर वक़्त कभी लौटता नहीं…
सारांश:
आानंद लीजिए हृदयस्पर्शी और भावनओं से भरी इन पद्य रचनाओं का! पहली रचना बचपन की यादों और बिछड़ते रिश्तों के उस गहरे भाव को चित्रित करती है जो समय की रफ्तार में कहीं खो जाते हैं। दूसरी रचना में एक आदर्श मन की कामना है जो करुणा, सहिष्णुता और एकता से भरपूर है। तीसरी रचना ग़ज़ल की शक्ति और गहराई को दर्शाती है — जहाँ भूख, इश्क़, इन्कलाब, आँसू और शबनम सब कुछ समाया है और चौथी रचना तपती धूप, रुकते जीवन और ठहरते समय का प्रतीक बनकर सामने आती है। यह कविता सिर्फ मौसम की बात नहीं, बल्कि समाज की निष्क्रियता की अभिव्यक्ति भी है। तो आइए इन्हें पढ़ें विस्तार से—
यह उम्र
बचपन की वह यादें —
साथ खेलने से लेकर गाँव के स्कूल
तब भी अच्छा लगता था ।
तुम्हारे साथ खेलना,बातें करना ,पढ़ना ।
कालेज ,नौकरी, बच्चे शहर दर शहर जाना।
उलझ गया था मैं कर्तव्य और उत्तरदाईत्व के बीच ।
आज लौटा हूँ अपने शहर में
निगाहें ढूँढ रही हैं तुम्हारा चेहरा
पर ,,, तुम भी तो मेरे इंतजार में बैठी तो
होगी नहीं ?
फिर तेरा चेहरा नज़र आया ।
साथ एक बच्चा भी ।
न वो दमकता चेहरा था न वो रूप
न तुम रूप की शहजादी थी
न मैं इश्क का शहजादा ।
हम दोनों के चेहरे की झुर्रियाँ बीते कल
का इतिहास था ।
सोचता हूँ एक होने की चाहत में
यह उम्र भी गुजर जाएगी
फिर भी ना मिले
चाहतों के फूल न खिले ,,,न खिले ।
*************************
मन
मन में उमड़ते भाव
रहे भावना ऐसी मेरी
किसी का मुझसे हो उपकार ;रहे भावना ऐसी मेरी
भूल से भी नही हो अपकार ;रहे भावना ऐसी मेरी
बदला लेने की प्रवृत्ति से; प्रभु
जी दूर ही रखना
धन की मादकता में मुझको ;न
ही इतना चूर ही रखना
लगे विश्व है मेरा परिवार ; रहे भावना ऐसी मेरी
भूल से भी न हो अपकार ; रहे भावना ऐसी मेरी
जाति पांती व ऊंच नीच का ;
मन में कोई भेद न पनपे
भाषा बोली गोरे काले का ; कोई
प्रभेद न पनपे
इतना तो करना उपकार ; रहे भावना ऐसी मेरी
*************************
ग़ज़ल में
इजहारे खुशी और बयाने गम है ग़ज़ल में
बेताब दिलों का ये मरहम है गजल में
तुम आइने की खोज में किस ओर जाओगे
इसमें हसीन चेहरा हम दम है ग़ज़ल में
इसमें है रोटी , भूख ग़रीबी और हर सवाल
इन्कलाब का लो ये परचम है ग़ज़ल में
आँसू का कतरा और लहू का उबाल है
हर राग है निहित सरगम है गजल में
खुद से नहीं देखा है तो अब देख लीजिए
शब्दों के नीच छुपी ये शबनम है गजल में
*************************
जम सा गया है
उमस मन जम सा गया है
पेड़ पौधे सहम सा गया है
बारिश का नहीं नामो निशाँ
जैसे आसमॉं थम सा गया है
चिचिलाती इस धूप में देखो
सड़क पे लोग थम सा गया है
पेट की आग बुझाने के लिए
काम पर बस थम सा गया है
क्या कहूँ ग़म मैं शबनम तुम्हें
ओंठ अपना ये जम सा गया है