“जीवन की राह, प्रेम की पीड़ा और प्रकृति की पुकार—संवेदनाओं में रची चार कविताएँ।”
भोला सागर , चन्द्रपुरा,बोकारो (झारखंड )
सब्र का इम्तिहान
तेरे दर्शन की प्यासी हैं ऑंखें,
क्यों छलिया बन छलते हो?
और न तड़पा,दर्शन दे,
क्यों सब्र का इम्तिहान लेते हो?
तुम्हारे इंतजार में बिताया,
है बेसब्री से हर पल।
मैंने कितना दर्द सहा,
रहता सुबह-शाम बेकल।।
जुदाई का एहसास न हुआ,
तुझको गीत,ग़ज़ल बनाया।
दिल रो रहा था मगर,
सबके सामने हँसकर गाया।।
खूब दर्द जब सताता है,
कागज कलम ले बैठ जाता हूँ।
सुनहरे पलों को याद कर,
कागज पर उसे उतारता हूँ।।
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कुछ पल का कुहरा
मुसीबत आई है तो चली जाएगी,
समझ लो कुछ पल का कुहरा है।
दिखता है ज़रूर अंधियारा घना,
मगर, हमेशा क्या यह ठहरा है?
डरना क्या है इस काली घटा से,
सूरज पर कबतक लगा पहरा है?
हाँ, मन को थोड़ा व्यथित करता,
इसलिए,लगता अधिक गहरा है।
धूल उड़ती रोज़ ऊपर की ओर,
छिपा कब आसमां का चेहरा है?
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सत्य और ईमान
खाली पाँव चलोगे और, काँटों को दोष दोगे।
समझा गये काँटों ने, तब भी नहीं समझोगे
? जब जागा तभी सवेरा, ऐसा नहीं होता है।
प्रकृति के अनुकूल हमें, चलना भी होता है।।
कुछ अपनी समझ तो, कुछ प्रकृति को देख।
जीवन को जीना है, करते हुए काम नेक।।
सत्य और ईमान कभी, मत देना तुम बेच।
ईमान रहे तो कहीं भी, मिल जाएँ हाथ अनेक।।
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पर्यावरण बचा लो
हे महामानव!
खतरे में है आज
संपूर्ण पर्यावरण
बचा लो
धरती,जल,जंगल
नभमंडल,हवा
विनष्ट होने से।
बचा लो
प्रलय होने से
मानवता को
संपूर्ण सृष्टि को।
समझो,
क्यों दिया है
हमें नेमत
कुदरत ने ?
क्यों रचा है
यह सृष्टि
कुदरत ने?
उत्थान का अर्थ
यह तो नहीं
कि सब कुछ
दाँव पर लगा
पतन का मार्ग
प्रशस्त किया जाए।
आज उत्थान और
पतन के बीच
लगी है होड़
इंसान जिस रास्ते
कदम रख रहा
उस रास्ते पर
खाई भी खोद रहा।
मानवता का इसमें
कल्याण नहीं है
रोज़ मानवता
अपाहिजों की तरह
तिल-तिल कर
मर रही है।
और हम हैं
कि इतिहास
रचने में लगे हैं
मानवता बचे
या न बचे
इससे बेख़बर हैं।