“शिवत्व में समाया समूचा संसार—नटराज के नृत्य से मोक्ष, शक्ति और सृष्टि का साक्षात्कार।”
यशवंत कोठारी, जयपुर
नटराज के लिए पूरा संसार नाट्यशाला है!
हमारी संस्कृति में मोक्ष जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। मोक्ष के लिए शिवरात्रि का ही
व्रत पुराण में वर्णित है। वास्तव में यह व्रत देवाधिदेव महादेव की महान् शक्ति का प्रतीक माना गया
है। शिव के विभिन्न स्वरुप देश में हैं। शत रुद्र संहिता में शिव की अप्टमूर्तियों के निम्न नाम दिए
गए हैं। शर्व, भव, भीम, पशुपति, ईशन, महादेव व रूद्र भगवान शिव को अर्धनारीश्वर तथा भैरव माना
गया है।
इसी संहिता में शिव के अन्य कतिपय प्रमुख अवतारों का भी वर्णन है। जो इस प्रकार हैं-श्रभ
अवतार, गृहपति अवतार, यक्षेश्वर अवतार, एकादश रूद्र अवतार, दुर्वासा यक्षेश्वर अवतार, महेश अवतार,
हनुमान अवतार, वृपभ अवतार, विप्लाद अवतार, वैश्य नाग अवतार, द्विजेश्वर अवतार, यतिनाथ अवतार,
कृप्ण दर्शन अवतार, अवधूतेश्वर अवतार, भिक्षुवर्य अवतार, सुरेश्वर अवतार, ब्रहम्चारी अवतार, सुनर
नर्तक अवतार, साधु अवतार, विभु अश्वत्थामा अवतार व किरात अवतार आदि।
शिवजी के द्वादश ज्योतिलिंगों का परिचय भी इस संहिता में दिया गया हे। ये हैं-सौराप्ट में
सोमनाथ, श्री शैल में मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकालेश्वर, विध्यांचल में औंकारेश्वर, हिमाचल में
केदारनाथ, डाकिनी में भीमशंकर, काशी में विश्वनाथ, गौतमी तट पर अम्बिकेश्वर, अयोध्यापुरी में
नागेश, चिंताभूमि में वैद्यनाथ, सेतुबंध में रामश्वर तथा देव संरवर में घुमेश्वर।
कुछ प्रसिद्ध श्विलिंगों का वर्णन भी कोशिश रूद्र जी ने इस प्रकार किया है-अत्रीश्वर महादेव,
नंदिकेश्वर, महाबलेश्वर, हाटकेश्वर, अंधेकेश्वर, बटुकेश्वर, सोमेश्वर, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर,ओंकारेश्वर,
केदारेश्वर, भीमेश्वर, विश्लेश्वर, अम्बकेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर,रामेश्वर, घुश्मेश्वर, हरिश्वर, व्याघेश्वर
आदि।
उमा संहिता में शिव पार्वती को हुंकार शब्द यानी अनाहत नाद शब्द की व्याख्या करते हुए
कहते हैं कि प्रतिदिन 2 घंटे इस शब्द को सुनने से मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है। इस शब्द में
घोपनांद, अंगनाद, वीणानाद, वंशजनाद, दुन्दुभिनाद, शंखनाद, मेघनाद समाहित हैं।
शिव के आठ नाम बताए गए हैं। शिव, महेश्वर, रूद्र, विप्णु, पितामाह, सर्वज्ञ, संसार वैद्य, और
परमात्मा। परन्तु शिव, महेश्वर और रूद्र ही प्रचलित नाम हैं। शिव की शक्ति योग रुप है। इस परा
शक्ति से ही चित्तष्शक्ति, चित्त शक्ति से आनंद और इसी से क्रमशः इच्छा, ज्ञान और प्रिय शक्ति की
उत्पति हुई है।
शिव शब्द का अर्थ प्रकृति से युक्त है। ज्ञान और शक्ति से परिपूर्ण है शिव, और यहीं से शुरु होता है
शिवत्व जो उमा से मिलकर पूर्ण प्रकृति बनता है। शिव की अप्ट मूर्तियों में ही विश्व गुफिंत है।
महादेवी साक्षात शक्ति है और महादेव शक्तिमान है। शिव महेश्वर और शिवा माया महामाया है।
वायकीय संहिता में श्री कृप्ण को संबोधित करते हुए उपमन्यु कहते हैं-शिवजी, प्रकृति, बुद्धि, अहंकार,
माया, आदि के बंधनों से परे है। ये वासना, भोग, कारण, कर्ता, आदि अंतर, अन्त आदि से अतीत है।
यही शिव का शिवत्व है।
हमारी संस्कृति के में शिव है और तीर्थ स्थानों का विशेप महत्व शिव से है।हर देवालय, मंदिर
में शिवलिंग स्थापना सहज है आवश्यक है। वाराणसी, उज्जैन, रामेश्वरम्, बदरी, केदार, हिमालय क्षेत्र
शिव की आराधना स्थल है। पुराणों में, शिव को सर्वसुलभ माना गया है।
(क्रमश:)
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