“ज़िंदगी के सबसे महंगे सबक किताबों में नहीं, गलतियों की फीस देकर मिलते हैं।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…आरव शर्मिंदगी के मारे चुप था। वह यह बात बताने पापा के सामने सिर झुका कर ख्रड़ा हो गया। उसकी आँखों में आंसू थे।
शशिकांत जी ने बिना कुछ पूछे कहा,
“बैठो।”
आरव ने धीमी आवाज़ में सब बता दिया।
“पापा… मेरी वजह से दो हज़ार रुपये ज़्यादा लग गए। सिर्फ़ मेरी लापरवाही से…”
शशिकांत जी कुछ नहीं बोले। अगली सुबह वे खुद कॉलेज गए, फीस और फाइन दोनों जमा कर दिए।
जब घर लौटे तो आरव उनके सामने खड़ा था—
“पापा, मैं वह दो हज़ार रुपये आपको लौटा दूँगा। पार्ट टाइम जॉब कर लूँगा।”
शशिकांत जी ने उसे गौर से देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था—बस गहराई थी।
“आरव,”
वे बोले,
“अगर मैं पैसे वापस ले लूँ, तो तुम सिर्फ़ रकम चुकाओगे… सबक नहीं।”
आरव चुप रहा।
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रात को खाना भी उसने ठीक से नहीं खाया। कमरे में बैठा बार-बार वही साइन याद कर रहा था।
काश, थोड़ा ध्यान दिया होता…
उसे लगा पिता नाराज़ हैं। शायद निराश भी।
आधी रात को दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।
“आरव…”
पिता की आवाज़।
शशिकांत जी उसके पास बैठे। हाथ में वही पुरानी फाइल थी।
“पता है,”
उन्होंने कहा,
“जब तुम्हारा अकाउंट खुलवाया था, तब हर महीने मैं उसमें पैसे डालता था। पर आज तक तुमसे यह नहीं कहा कि उसमें कितना बैलेंस है।”
आरव चौंक गया,
“कितना है, पापा?”
शशिकांत जी ने फाइल खोली। बैंक स्टेटमेंट सामने रखा।
“इतना,”
उन्होंने शांत स्वर में कहा।
राशि देखकर आरव की आँखें भर आईं।
“पापा… यह तो… मेरे लिए?”
शशिकांत जी की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई—
“हाँ। तुम्हारे भविष्य के लिए। पर याद रखो, यह पैसा तभी काम आएगा, जब तुम उसे संभालना सीखोगे।”
आरव की आँखों से आँसू बहने लगे,
“पर पापा, दो हज़ार रुपये…”
शशिकांत जी ने उसके कंधे पर हाथ रखा—
“बेटा, यह दो हज़ार रुपये फाइन नहीं थे…
यह ज़िंदगी की प्रैक्टिकल क्लास की ट्यूशन फीस थी।”
आरव ने सिर उठाया।
“आज तुम्हें समझ आया कि एक छोटी सी लापरवाही भी आर्थिक नुकसान बन सकती है।
आज नुकसान छोटा है…
कल अगर ज़िम्मेदारी बड़ी होगी और ध्यान छोटा—तो नुकसान बहुत बड़ा होगा।”
कमरे में सन्नाटा था। बाहर बारिश रुक चुकी थी।
आरव ने धीरे से पिता के पैर छुए,
“पापा, आज आपने मुझे सिर्फ़ पैसा नहीं… ज़िंदगी सिखाई है।”
शशिकांत जी की आँखें नम थीं, पर होंठों पर मुस्कान थी।
“बस यही चाहता था, बेटा।”
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अगले दिन आरव बैंक गया। सिग्नेचर अपडेट करवाए। हर काग़ज़ ध्यान से पढ़ा।
उस दिन से उसने तय कर लिया—
अब हर फ़ैसला सोच-समझकर होगा।
क्योंकि कुछ सबक किताबों से नहीं…
ज़िंदगी की ट्यूशन फीस चुकाकर ही मिलते हैं।
(काल्पनिक रचना)