दीपावली का असली उजाला तो रिश्तों की सफ़ाई में है!”
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प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
सारांश:
दीपावली की सफ़ाई में जुटी शकुन्तला देवी कबाड़ बेचते-बेचते गलती से पति का कीमती बक्सा बेच बैठती हैं, जिससे घर में हंगामा मच जाता है। हास्य और उलझन के बीच कहानी सिखाती है कि असली सफ़ाई केवल घर की नहीं, रिश्तों और मन की भी ज़रूरी है। अंत में दीपों की रौशनी के साथ सबक मिलता है—कभी-कभी सबसे कीमती चीज़ें कबाड़ में छिपी होती हैं। वो चीजें क्या थीं और क्या शकुन्तला मैडम का आपरेशन ‘नीट एंड क्लीन’ कामयाब हुआ? आइए विस्तार से जानें इस मजेदार हास्य रचना के आखिरी चैप्टर में —
…रमेश बाबू दूर से घूर रहे थे—
“ध्यान रखना, कहीं फिर मेरा सामान न बेच देना।” शकुन्तला बोलीं, “अब क्या तुम्हारी पुरानी नेकर भी बचाकर रखूं?
अजीब स्थिति!
सफाई करते-करते शकुन्तला देवी स्टोर रूम में पहुँचीं।
वहाँ एक बड़ा सा लकड़ी का बक्सा रखा था, जो सालों से नहीं खुला था।
“हम्म… लगता है खज़ाना है!” उन्होंने खुद से कहा।
ज्यों ही उन्होंने बक्सा खोला, उसमें से पुराने कपड़े, टूटी झालरें, और एक डिब्बा मिला जिसमें चूहे ने अपनी रिटायरमेंट कॉलोनी बना रखी थी।
“छी! ये तो पूरा कबाड़ख़ाना है!”
उन्होंने बक्से को खींचा और कबाड़ी के पास ले गईं।
“इसे भी ले जा बेटा, बक्सा है, पर काम का नहीं।”
कबाड़ी बोला—“ठीक है माई, 150 रुपये।”
रमेश बाबू बोले—“150 में मेरा सामान बिक जाएगा!”
“क्या मतलब?” शकुन्तला ने पूछा।
“अरे उसमें मेरी पुरानी फोटोज़ थीं, सर्विस सर्टिफिकेट, और बैंक पासबुक तक!”
“क्या???” शकुन्तला के हाथ से झाड़ू गिर गया।
“तो अब क्या करें?”
कबाड़ी वाला मुस्कराया, “माई, मैंने तो अभी तक साइकल भी नहीं घुमाई, बक्सा यहीं है।”
रमेश बाबू भागकर बक्से में झाँकने लगे।
“धन्य हैं लक्ष्मी माता! सब सुरक्षित है।”
शकुन्तला देवी ने माथा पकड़ा—“हे भगवान! कबाड़ के चक्कर में मेरा ही कबाड़ा हो जाता!”
मोहल्ले की चर्चा
दोपहर में जब शकुन्तला देवी चाय बना रही थीं, तभी पड़ोसन रेखा आईं—
“अरी बहन, आज तुम्हारे घर बहुत चहल-पहल है, सब ठीक?”
शकुन्तला ने कहा—“अरे क्या बताऊँ, कबाड़ बेचते-बेचते तो मेरा ही जीवन कबाड़ा हो गया! ऐसा टेंशन लिया कि सोचा, अगले जन्म में सफाई कर्मी नहीं, कबाड़ी बनूंगी!”
रेखा हँसते-हँसते बोली—“क्यों?”
“क्योंकि आजकल कबाड़ी ही सबसे समझदार बिज़नेस मैन है—हर चीज़ की कीमत जानता है!”
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
दीपावली की रात
शाम तक घर चमचमा उठा। दीवारें धोई गईं, दीए सजे, और लाइटों की लड़ियाँ झिलमिला रही थीं।
रमेश बाबू मुस्कराते हुए बोले—
“देखा, जो कबाड़ तुम बेचने जा रही थी, वही फाइलें आज बिजली के बिल भरने में काम आईं!”
शकुन्तला बोलीं—“हाँ, और जो पुरानी साड़ियाँ रखी थीं, उनसे मैंने दीयों के नीचे सुंदर पोटली कवर बना दिए!”
“वाह, मतलब जो बचा वो भी काम आया!”
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई—वही कबाड़ी खड़ा था।
“माई, दीपावली की शुभकामनाएँ! ये देखो, आपके बक्से में से एक फोटो गिरी थी।”
शकुन्तला ने फोटो ली—वो उनकी शादी की थी।
“अरे! ये तो मेरी ब्याह की तस्वीर है!”
कबाड़ी बोला—“मैंने सोचा, ये चीज़ रुपयों से ज़्यादा कीमती होगी।”
शकुन्तला ने मुस्कराकर कहा—“बिलकुल सही कहा बेटा। कभी-कभी असली कीमती चीज़ें कबाड़ में छिपी होती हैं।”
संदेश
दीपावली की रात दीयों की रोशनी में शकुन्तला ने सोचा—
“हम सफाई तो करते हैं घर की, पर क्यों न थोड़ा मन का कबाड़ भी साफ़ करें—पुरानी शिकायतें, रूठे रिश्ते, और अहंकार…”
उन्होंने रमेश बाबू से कहा—
“जानते हो, इस बार दीवाली की सबसे बड़ी सीख ये है—कभी-कभी जो हम ‘बेकार’ समझते हैं, वही सबसे ज़रूरी निकलता है। इसलिए चीज़ों के साथ-साथ लोगों की अहमियत भी समझनी चाहिए।”
रमेश बाबू मुस्कराए—“तो फिर अगली बार मैं भी तुम्हारे साथ सफाई करूंगा।”
“ज़रूर,” शकुन्तला बोलीं, “पर ध्यान रखना, कहीं गलती से मुझे ही कबाड़ में मत बेच देना!”
दोनों ठहाका लगाकर हँस पड़े।
दीयों की रौशनी में घर, दिल और रिश्ते—तीनों चमक उठे।
दीपावली केवल घर की सफाई का त्योहार नहीं, बल्कि मन और रिश्तों को चमकाने का भी अवसर है।
कबाड़ बेचिए, पर कभी अपनों को ‘बेकार’ मत समझिए — क्योंकि असली रोशनी वहीं से आती है।
(काल्पनिक रचना)