“दीपावली का असली उजाला तो रिश्तों की सफ़ाई में है!”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
सारांश:
दीपावली की सफ़ाई में जुटी शकुन्तला देवी कबाड़ बेचते-बेचते गलती से पति का कीमती बक्सा बेच बैठती हैं, जिससे घर में हंगामा मच जाता है। हास्य और उलझन के बीच कहानी सिखाती है कि असली सफ़ाई केवल घर की नहीं, रिश्तों और मन की भी ज़रूरी है। अंत में दीपों की रौशनी के साथ सबक मिलता है—कभी-कभी सबसे कीमती चीज़ें कबाड़ में छिपी होती हैं। वो चीजें क्या थीं और क्या शकुन्तला मैडम का आपरेशन ‘नीट एंड क्लीन’ कामयाब हुआ? आइए विस्तार से जानें इस मजेदार हास्य रचना में—
“अरे सुनो जी! इस बार दीपावली पर घर की ऐसी सफ़ाई करूंगी कि लक्ष्मीजी भी अगर गलती से आएँगी तो कहेंगी—‘भाभी, इतना चमचमाता घर तो हमने अपने वैकुंठ में भी नहीं देखा!’”
शकुन्तला देवी ने हाथ में झाड़न घुमाते हुए घोषणा की।
पति महोदय, रमेश बाबू, जो अख़बार पढ़ रहे थे, बोले—
“हाँ हाँ, बस इतना ध्यान रखना कि साफ़-सफ़ाई करते-करते फिर मेरी पुरानी फाइलें मत बेच देना, पिछली बार बिजली बिल की रसीदें कबाड़ी वाले के साथ रवाना कर दी थीं!”
“अरे वो तो गलती से हुआ था!” शकुन्तला देवी ने झेंपते हुए कहा, “इस बार तो मैं प्रोफेशनल क्लीनिंग मोड में हूँ।”
सफाई अभियान की शुरुआत
अगले दिन से ही घर में “ऑपरेशन कबाड़” शुरू हो गया।
ड्रॉइंग रूम से लेकर स्टोर रूम तक, हर कोना शकुन्तला देवी के निशाने पर था।
“यह पुराना जग तो कबाड़ में जाएगा… यह टूटी बाल्टी… यह डिब्बा जिसमें शायद पिछली सरकार की यादें होंगी…”
रमेश बाबू ने टोका—“अरे यह तो मेरा बचपन का रेडियो है! इसमें गाने बजते थे—‘लग जा गले…’”
“तो अब क्या रेडियो से ही दीपावली मनाओगे? टीवी है, मोबाइल है, एलेक्सा है! पुरानी चीज़ों को जाने दो, नई खुशियों के लिए जगह बनाओ,” शकुन्तला देवी ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा।
कबाड़ी वाला आया
“कबाड़ीवाला! लोहे-लक्कड़ वाला!” गली में आवाज़ गूंजी।
शकुन्तला देवी फौरन बालकनी में आईं—“ओ भाई, इधर आओ! आज तो तुम्हारा दिन बन जाएगा!”
थोड़ी देर में एक पतला-दुबला कबाड़ी साइकल लेकर आया।
“क्या-क्या है, माई?” उसने मुस्कराते हुए पूछा।
“सब है बेटा, पुरानी किताबें, अख़बार, बर्तन, अलमारी का एक दरवाज़ा तक!”
“दरवाज़ा?” कबाड़ी ने हैरान होकर पूछा।
“हाँ, अलमारी का दरवाज़ा अलग हो गया था, अब काम का नहीं।”
कबाड़ी ने तराज़ू निकाला और तोलने लगा।
रमेश बाबू दूर से घूर रहे थे—
“ध्यान रखना, कहीं फिर मेरा सामान न बेच देना।” शकुन्तला बोलीं, “अब क्या तुम्हारी पुरानी नेकर भी बचाकर रखूं?
क्रमश: