सुनीता मिश्रा
आज 12th बोर्ड का आखिरी दिन था। अंश परीक्षा देकर हॉस्टल के अपने कमरे में आया तभी मोबाइल पर रिंग होता देख उसने मोबाइल उठा कर देखा उसके पिता किशन जी का फोन था।
“गुड आफ्टरनून पापा। कैसे हैं आप और मम्मी?”
“हम ठीक हैं! कल दोपहर के फ्लाइट से तुम आ जाओ; संडे के दिन हमें अंडमान निकोबार घूमने के लिए जाना है तुम्हें तो
पता है ।”
“मैं नहीं आ रहा पापा!” मैंने पहले ही कहा था कि इस बार छुट्टियों में गांव चलेंगे! दादी मां के पास। किंतु आप लोगों ने अपनी मर्जी की तो मैं नहीं आ रहा हूॅं।
मैंने अपने मित्रों के साथ कहीं और घूमने जाने का प्लान किया हैं। अतः आप लोग जाकर अंडमान निकोबार घूम कर आइए , मैं नहीं आ रहा हूॅं।
किशन जी और उनकी पत्नी श्वेता अंश को बहुत देर तक समझाते रहे किंतु, अंश ने जैसे नहीं समझने का कसम खा लिया हो।
अंश, किशन और श्वेता का इकलौता बेटा है। अंश बचपन से ही जिद्दी स्वभाव का बच्चा रहा है । बहुत छोटे से ही हॉस्टल में रहने के कारण उसे माता-पिता से बहुत ज्यादा लगाव नहीं है।
अंश आज तक अपने दादा जी के गांव नहीं गया है। बचपन से गांव जाने की वह जिद करता रहा, किंतु किशन और श्वेता उसे गांव लेकर कभी नहीं गए।
अंश जब छोटा था, तब उसके दादा और दादी एक दो बार उससे मिलने के लिए दिल्ली आए थें। तब अंश बहुत छोटा था किंतु फिर भी उसे अपने दादा और दादी का प्यार- दुलार खूब याद है।
आखिरकार थक हार कर किशन और श्वेता ने गांव जाने का ही मन बनाया। किशन और श्वेता दोनों ही नौकरी करते हैं। दादा जी के मृत्यु पर भी अंश गांव नहीं गया था । तब उसकी परीक्षा चल रही थीं इसलिए
अंश को उसके दादा की मृत्यु के बारे में नहीं बताया गया था। बाद में पता चलने पर वह बहुत रोया था।
मेन रोड़ से गांव की पतली सड़कों पर टैक्सी के मुड़ते ही अंश ने खुश होते हुए पूछा ” पापा हम गांव आ गए क्या?”
बस आधा किलोमीटर और है। किशन जी की बात पूरी होते ही टैक्सी का ड्राइवर ने पूछा – “आपको किसके घर जाना है ? मेरा घर भी इसी गांव में है।”
“अच्छा आपको शायर बाबा के घर जाना है?”
क्रमश:
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