“जब अनुमति बाहर से नहीं, भीतर से मिलती है—तभी आत्मसम्मान बोलता है।”
️सुनीता मिश्रा, देहरादून
…ननद का आज का यह व्यंग अर्चना के हृदय ने सहने से इनकार कर दिया। बहुत हुआ अब और नहीं!! अर्चना के हृदय ने विरोध करना शुरु किया।
अर्चना मुस्कुराई!
ननद की तरफ देखी और बोली- “अब मुझे किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है। अब मुझे अनुमति सिर्फ और सिर्फ अपने आप से लेना है। क्योंकि मेरी इतनी उम्र हो गई कि मैं अपना अच्छा और बुरा समझ सकूं।” अर्चना ने मुस्कुराते हुए किंतु दृढ़ता पूर्ण कहा।”
” और माफ कीजिए! अनुमति उससे मांगी जाती है जो समाज की परवाह न कर के अपने जीवन-संगिनी की खुशियों का ध्यान रखकर निर्णय लेता हो। ना कि पूरी जिंदगी समाज और परिवार के डर से अपनी जीवन साथी की खुशियों का गला घोंटते रहें।” अर्चना मुस्कुराते हुए अपनी बातें बोलते जा रही थी।
अब मुझे अनुमति की नहीं सलाह की जरूरत होती है। और यह सलाह मुझे मेरे बच्चे दिया करते हैं। मेरी खुशियों के लिए। मैं जो भी कर रही हूॅं वह अपने बच्चों से सलाह लेकर कर रही हूॅं।
मेरे बच्चे मेरे हर फैसले में साथ होते हैं और निर्णय मेरा खुद का होता है।
अर्चना एक साथ में ही सारी बातें बोल गई।
यह जवाब आज का नहीं बल्कि 25 सालों से अपमान तिरस्कार सहकर भी चुप रहने के बाद का जवाब था। जो आज शब्द रूपी बारूद बनकर निकल गया था। भाई बहन दोनों शांत हो गए, एक दूसरे का चेहरा देख रहे थें। दोनों का चेहरा उत्तर गया था।
सच्चाई को स्वीकारने वाले नंदोई अर्चना की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थें और उसकी बातों में सहमति जाहिर कर रहे थें।
अर्चना बहुत हल्की महसूस कर रही थी। सालों सब कुछ सहकर भी मुस्कुरा देना किंतु अंदर ही अंदर पीड़ा को समेटे रहना छोटी बात नहीं होती। उसने आज तक यही किया है किंतु आज वह निर्भीक होकर उचित जवाब देकर खुद को हल्की और प्रसन्नचित महसूस कर रही थी।
अर्चना सोच रहीं थीं की काश शादी के बाद से ही गलत बातों का विरोध की रहती तो अंतर आत्मा पर पीड़ा रूपी इतनी बड़ी गठरी नहीं रखी हुई होती। और नाही परिवार के छोटे-बड़े सभी सदस्योंको उसका अपमान और तिरस्कार करने की इतनी हिम्मत होती।
पांच-छह दिनों के बाद अर्चना की ननद और नंदोई जा रहे थें। अर्चना ने हाथ जोड़ते हुए कहा- “कोई भूल चुक हुई हो तो माफी चाहूंगी।”
“अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। बस आपके घर अगर कोई आता है तो खाना जल्दी बना दिया कीजिए बहुत देर से खाना बनाती है आप!”
अर्चना की ननद ने एक और व्यंग्य मुस्कुराते हुए दाग दिया।
“कोई नहीं आपकी बात सही है किंतु जल्दी बन जाने पर ठंडा हो गया है बोलकर अक्सर मेहमान खाने में नुक़्स निकालते हैं इसीलिए जरा देर
से गरमा-गरम खाना बनाती हूॅं। अबसे आप जब भी आइएगा हम दोनों मिलकर बना लिया करेंगे जल्दी हो जाएगा!” अर्चना ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
अर्चना वर्षों से ताने-व्यंग अपमान-तिरस्कार सुन-सुनकर थक गई है अब वह भी अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए जवाब देना चाहती है।
आज तक जब उसके पक्ष में किसी ने नहीं बोला तो वह अब किसी और की आशा भी नहीं करती हैं।
अर्चना समझ गई है की शुगर की बीमारी में चीनी से परहेज करना होता है शहद थोड़ा बहुत खाया जा सकता है। मतलब यह की डायबिटीज का इलाज होम्योपैथिक की मीठी गोलियां खाकर ही किया जाना ज्यादा उचित है।
(काल्पनिक रचना)