“कुछ मोहब्बतें मुकम्मल नहीं होतीं, फिर भी पूरी ज़िंदगी का सहारा बन जाती हैं।”
आश हम्द, पटना (बिहार)
…एजाज ने हड़बड़ाकर अपनी नज़रों को उस हसीना पर से हटाई और उन सबको शिकारे पर बिठाकर शिकारे को झील में तैराने लगा ।
एजाज ने जबसे शिकारा चलाना शुरु किया था, तब से लेकर अब तक उसने हज़ारों पर्यटकों को इस झील की सैर करवाई है । रात में भी करवाता रहा है लेकिन, यह झील आज से पहले इतना खुबसूरत कभी नहीं लगा था । आज कुछ नयी सी बात थी, कुछ अलग ही एहसास ने दिल को छुआ था ।
आठ बजे से लेकर दस बजे तक उन्होंने सैर किया जाते हुए नीतू मैडम ने चार हज़ार के अलावा पाँच सौ ज़्यादा दे दिया था । एजाज ने सोचा कि, उन्होंने ग़लती से दे दी है इसलिए उसने वापस करना चाहा था, लेकिन उन्होंने लेने से ये कहते हुए मना कर दिया कि -– “ आज मेरा जन्मदिन है तो इन पैसों से अपने परिवार के लिए मिठाई लेते जाना ।” उन्होंने बड़ी नर्मी से कहा । एजाज को एक्स्ट्रा पैसे देने की वजह से उनकी सहेलियां गुस्से से उन्हें घूरने लगीं । एजाज ने मुस्कुराते हुए पैसे रखे और उन्हें जाता देखता रहा और वो ये सोचता हुआ घर की ओर चल पड़ा कि – ‘अब पता नहीं इस हसीना से दोबारा कब मुलाकात होगी, होगी भी या नहीं ये भी नहीं मालूम ।’ बस घर जाते हुए उसे लग रहा था कि, उसका जिस्म तो चला जा रहा है लेकिन, वो अपना आप वहीं कहीं छोड़े जा रहा है या वह हसीना अपने साथ उसे भी लिए जा रही थी ।
वह घर आया तब भी खोया खोया सा था । माँ-बहन ने पूछा भी ‘क्या हुआ’ मगर उसने सिर दर्द का बहाना बनाकर टाल दिया । जब सोने के लिए गया तो नींद का तो कोई अता पता ही नहीं था, ज़बरदस्ती आँखें बंद करके सोने की कोशिश करता तो छम से उस हसीना का अक्स झिलमिलाने लगता । वह एकदम से घबरा कर अपनी आँखें खोल देता । आज एजाज को अपनी कैफियत समझ में नहीं आ रही थी लगता था जैसे, कुछ खो गया है, कभी वापस न मिलने के लिए । ऐसे ही करवटें बदलते-बदलते रात के न जाने किस पहर उसकी आँख लगी थी । फिर भी सुबह उसकी आँख जल्दी खुल गई वह तैयार होकर फूल खरीदने की गर्ज से निकल पड़ा ।
बाहर हल्की-हल्की बर्फ गिर रही थी । रास्तों पर बर्फ की पतली चादर बिछी हुई थी, सितंबर महीने के शुरू होते ही यहाँ रात को हल्की-फुल्की बर्फबारी शुरू हो जाती है ।
सर्दियों में तो बर्फ से पूरा शहर ही ढक जाता
यहाँ तक की झील का पानी भी जम जाता है । तब उस मौसम में सारे शिकारे वाले का धंधा लगभग बंद ही हो जाता । फूलों की टोकरियां लिए जब वो वापस आ रहा था, तब सूरज की किरणें ज़मीन को छूने लगे थे और ज़मीन पर बिछी बर्फ की चादर धीरे-धीरे पिघलने लगी थी ।
वह घर पहुँचा तो, उसकी अम्मी चाय बनाकर सबको दे रही थीं ।
क्रमश: