“कुछ मोहब्बतें मुकम्मल नहीं होतीं, फिर भी पूरी ज़िंदगी का सहारा बन जाती हैं।”
आश हम्द, पटना (बिहार)
…उस दिन के बाद कई दिन तक नीतू नहीं आईं तो एजाज को फ़िक्र हुई तो वह जाकर उस होटल में भी पता कर आया जहाँ नीतू ठहरी हुई थी, लेकिन वहाँ से कुछ भी पता नहीं चल सका वो निराश सा लौट आया । वो दिन भर उसका इंतज़ार करता रहता, उसकी राहों में आँखें बिछाए रखता लेकिन वो वसंत ऋतु की तरह कुछ लम्हें की रिफाकत देकर गायब हो गई थी । वो जितना ज़्यादा सोचता, उसकी बेचैनियां बढ़ती जाती वो चाहता था कि वो न सोचे उसके बारे में, लेकिन उसका कोई एक लम्हा भी नीतू के ख्याल से खाली नहीं होता ।
दिन पर दिन गुज़रते जा रहे थे और उसका इंतज़ार भी बढ़ता जा रहा था । एक एक करके दिन और महीने बितते रहे क्योंकि इंसान तो कभी, कहीं, किसी मोड़ पर रुक जाना चाहता है, थम जाना चाहता है लेकिन वक्त किसी के लिए कभी नहीं रुकता वो अपनी उसी रफ्तार से चलता रहता है, इंसान भले रुका रह जाए । एजाज भी उसी एक लम्हें में रुक गया था जब उसने पहली बार नीतू को देखा था और वहीं थम गया था ।
कुछ कहानियां शायद शुरू ही इसलिए होतीं हैं कि वो अधूरी ही रह जाएं । वो पूरी हो जाएं तो शायद अपनी ख़ूबसूरती खो दें, उनकी सारी ख़ूबसूरती उनके अधूरेपन में ही होती हैं । लेकिन जो किरदार इन कहानियों को जीते हैं उन पर क्या बीतती है यह कोई भी अंदाज़ा नहीं लगा सकता । पल-पल का जीना, पल-पल का मरना हर किसी के बस की बात नहीं होती है ।
एजाज की कहानी भी अधूरी ही रह गई थी । उस एक लम्हें, जिसकी क़ैद से एजाज आज तक निकल नहीं सका, उसको बीते तीस साल हो गए थे । एजाज के बालों में चाँदी उतर आईं थीं । इन तीस सालों में उसने अपने सारे फ़र्ज़ निभाए थे सिवाय एक के, वो आज तक ख़ुद को किसी और के साथ देख सकने की हिम्मत नहीं कर पाया था । वो आज भी शिकारे पर सैलानियों को सैर करवाता है इस उम्मीद में कि कहीं किसी रोज़ वो अचानक आ जाएंगी और कहेंगी – “ एजाज, मुझे सैर करवाओगे ?” यह सोचकर वह मुस्करा देता और पानियों में उसके अक्स को देखते हुए शिकारे को आगे बढ़ा ले जाता………
(काल्पनिक रचना)