“असली अमीरी जेब से नहीं, दिल और सोच की विशालता से पहचानी जाती है।”
श्यामकांत देशपांडे, नागपुर
श्रीमती पारिख के हमारी दुकान में आते ही जैसे पूरा माहोल ही जैसे बदल जाता था ,कारण भी
बहुत थे ,एक तो उनकी लम्बीचौड़ी कार ,साथ में नौकरानी और बहुत बड़ी सामान की लिस्ट
,कपडे ,साड़िया ,चद्दरे कबी दामाद के लिये सूट का कपड़ा , यहा तक की टाँवेल से रुमाल तक उनकी लिस्ट में शामिल रहते थे।
सभी कर्मचारी एकदम खुश हो जाते थे , साथ में उनके व्यक्तित्व और अत्यंत सुरीली आवाज में एक अलग ही कशिश थी।
उनके साथ उनके घर पर काम करने वाली लछमी बाई हमेशा साथ रहती थी |
आखिर खुश भी क्यों न हो , शहर की अत्यंत संस्कारित ,धनाढ्य ,शिक्षित परिवारों के
क्रम में उनका पहला नंबर कई सालो से था , कई कारखानों , सामाजिक संस्थानों में उनके
परिवार का वर्षो से एकछत्र अधिपत्य जो था ,परिवार के कई सदस्य पश्चिमी देशो में अनेक
उच्चस्थ पदों पर थे |
एक दिन एक मध्यम काठी की महिला अत्यन्त साधारण लिबास में रिक्शे से हमारी दूकान
पर आई ,लेकिन कर्मचारी उसे देखकर एकदम पहचान नहीं पाए ,लेकिन उसका आत्म विश्वास
देखकर फिर भी सब लोग दंग थे , आते ही उसने बड़ी लम्बी आवाज में कहा |
‘’मेरा नाम लछमी है , मै सिविल लाइन में रहने वाले पारिख परिवार में काम करती हू , फिर
भी एक शरारती कर्मचारी ने उससे पूछ ही लिया ‘’,क्या काम करती हो बहन’’ उसने तपाक से
उत्तर दिया ,’’ काम ? सभी काम ,सफाई ,खाना बनाना ,बच्चो को स्कूल छोड़ना , मेहमानों का
ध्यान रखना |
मै अधिकतर गल्ले में बैठने के कारण हिसाब करने ही व्यस्त रहता था ,लेकिन उनकी बाते इस
बार ध्यान से सुन रहा था ,सामान्यतः हम खरीददार की आर्थिक स्थिति को देखकर ही उसे
सामान दिखाते थे , ताकि उसका भी मान सम्मान बना रहे लेकिन उसने बड़े अधिकार से कहा ,
‘’देखो सिविल लाइन वाले बंगले के मालिक के यहाँ लड़की की शादी है , मुझे उसके लिए एक
महँगी साडी खरीदकर भेट करना है और हाँ कीमत की चिंता मत करना ‘’
मैंने सोचा किसंगती का असर सब पर होता है , तभी इस महिला में इतना आत्म विश्वास है , खैर साडी
लेकर वह चली गई |
दुसरे दिन ही श्रीमती पारिख दलबल सहीत खरीददारी करने आ पहुची , ढेर सारा सामान ,कपडे
और जाने क्या क्या सामान और भेट वस्तुए खरीदी ,सामान के लिए दूसरी गाड़ी और साथ में
नौकर भी साथ में थे , अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप वे पैसे हमेशा बाद में ही भेजती थी ,हमारे
धन्यवाद ,नमस्कार के बाद बाहर सबके साथ जाकर वे कार में बैठगई ,कार जाने के लिए शुरू
भी हो गई ,फिर अचानक कार का दरवाजा खोलकर वापस आगई आते ही बड़े अनमने ढंग से
बोली ‘’ अरे क्या बताए घर में शादी हो तो सबको कुछ न कुछ देना ही पड़ता है ,मै तो भूल ही
गई की हमारी नौकरानी लछमी बाई के लिए भी एक साडी लेना है ‘’ उनका चेहरा देखकर हम सब
दंग रह गए
बोली ‘’ कोई भी एक सस्ती सी साडी देना ‘’’ जब साडी लेकर वे चली गई तो मै तो जैसे
स्तब्ध ही रह गया ,सब लोग मेरी तरफ पता नहीं क्यों देख रहे थे ,तब तक बिल भी बन गया
था जो हजारो में था ,मै सोच रहा था यह महिला उस महिला के लिए साडी मांग रही थी जो
कल ही इसी दूकान में कह रही थी ‘’ देखो बहुत अच्छी साडी देना और हाँ कीमत की
फिकर मत करना
‘मैं सोच में पड़ गया,, ’ कौन अमीर है ?
(काल्पनिक रचना)
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