“प्रकृति का संदेश, कल्पना का आकाश और यादों का मधुर अहसास”
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🌍 धरती की पुकार सुनो
धरती की पुकार सुनो,
देश के ठेकेदार सुनो,
ऐ मेरे दिलदार सुनो,
मानव कृत्य से रोती है धरती,
उसकी करुण पुकार सुनो।
आधुनिकता में अंधे होकर,
जंगल सारा काट दिया,
कल-कल बहती नदियों के
स्वाभाविक बहाव को पाट दिया।
खनिज संपदा का दोहन कर,
धरती की कोख को खाली किया,
समतल कर पर्वतों को भी,
प्रकृति का संतुलन डगमगा दिया।
हर चीज़ की एक हद होती है,
पर हमने सीमाएँ तोड़ दीं,
अर्थ और लाभ की दौड़ में
धरती की साँसें ही छोड़ दीं।
अब बंद करो यह खेल धरा से,
वरना बहुत पछताएँगे,
अपनी ही करनी के कारण
महाप्रलय को बुलाएँगे।
— शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
✨ गगन की सैर
चलो गगन की सैर करें हम,
बच्चों मिलकर साथ में,
है परियों का देश राह में,
जादू जिनके हाथ में।
सुंदर-सुंदर मुखड़े उनके,
धवल-धवल से वस्त्र हैं,
पंख लगे हैं उड़ जाने को,
यही उनके शस्त्र हैं।
दिखते पहले चंदा मामा,
साथ चली है चाँदनी,
आजू-बाजू टिमटिम तारे,
गाते मधुर सी रागिनी।
गंगा भी बहती लगती है,
देखो तुम आकाश में,
जिसका पूरा हाथ है रहता
अंधेरे के सर्वनाश में।
सप्तऋषि जब पास में आएँ,
करना सभी प्रणाम है,
चंदा से भी ऊँचा बच्चों,
इनका पावन धाम है।
नवग्रह हैं जीवन के दाता,
सब सूरज के संग हैं,
अलग-अलग हैं आसन इनके,
सबके अपने रंग हैं।
सूरज ही तो सबको देता
ऊर्जा, भोजन, ताप भी,
हाथ जोड़कर नमन करो सब,
साथ हमारे आप भी।
—पंकज शर्मा “तरुण”, मंदसौर
🎨 स्मृतियों के रंग
अपनत्व की धूप पड़ती है
मन के किसी कोने में,
स्मृतियों के रंग खिल उठते हैं
जीवन के आँगन में।
हृदय-कुंज महक उठता है
पलाश के पुष्पों जैसा,
अपनेपन का ठहराव आता
शीतल सरिता जैसा।
दर्द-ए-दिल, बेचैनियाँ, हलचल,
सब धीरे-धीरे थम जातीं,
आँखों की नमी और मौन कथाएँ
मन की भाषा बन जातीं।
गहराई समंदर-सी ख़ामोशी,
मूक मौन का विस्तार,
अकेलेपन की तन्हाई से
हो जाता मन का संवाद।
रिश्तों-नातों की उलझन में
संकुचित होता जीवन,
शब्द और भाव मिलकर रचते
स्मृतियों का मधुर बंधन।
मन शांत होकर ढूँढ़ता है
शब्दों का कोई साज़,
चलते जाते हैं समय संग
कल, आज और हर आज।
जीवन-सफ़र में खोने का भय,
संशय की आती लहर,
पुरानी स्मृतियाँ दस्तक देकर
भर देतीं मन का शहर।
फिर भी चलते रहना है जीवन,
हँसते हुए बेफ़िक्र,
मन करता है खो जाए फिर
उन रंगों में निश्चिंत।
—सुशीला तिवारी , पश्चिम गांव, रायबरेली