“कुछ मोहब्बतें मुकम्मल नहीं होतीं, फिर भी पूरी ज़िंदगी का सहारा बन जाती हैं।”
आश हम्द, पटना (बिहार)
…जब दोनों बच्चे छोटे थे उनकी कमाई से मुश्किल से गुज़ारा हो पाता था । तब गुलशन ने अनवर को बहुत समझाया, मनाया कि, वह कुछ काम कर लेगी तो दो पैसा ज़्यादा घर में आएंगे तो गुज़ारे में थोड़ी आसानी हो जाएगी । लेकिन अनवर को ये बिल्कुल मंजूर नहीं था कि उनकी महबूब बीवी बाहर जाकर कोई काम करे । इसलिए उन्होंने गुलशन को सख़्ती से मना कर दिया
कि – “ तुम्हें कोई जरूरत नहीं है बाहर जाकर कुछ करने की । अभी मैं ज़िंदा हूं मैं सब संभाल लूंगा तुम फिक्र ना करो ।”
अनवर ने गुलशन को तो चुप करवा दिया लेकिन अपने दिल और दिमाग़ में उठते सवालों के शोर को कैसे चुप करवाते, गुलशन को तो इतमीनान दिलवा दिया तो दिन भर की थकी हारी, सुकून से सो गईं । लेकिन दिन भर की थकान से चूर होने के बावजूद भी आज अनवर की नींद उनसे कोसों दूर थी । वो टकटकी बांधे अपनी झोपड़ी की बांस से बनी हुई छत को देखते-देखते पूरी रात गुज़ार दिए । सुबह की अज़ान से कुछ पहले उनकी आँख लगी थी, इसलिए फज्र की नमाज़ वो अदा न कर सकें । जब उठे तो उन्होंने एक तरकीब सोच ली थी जिससे उनकी आमदनी में कुछ इज़ाफ़ा होने की उम्मीद थी । सुबह से शाम तक वह शिकारे पर पर्यटकों को सैर करवाते थे, फिर घर आ जाते । कभी कभी ही ऐसा होता कि कोई पर्यटक रात को झील की सैर करना चाहता और पैसे भी अच्छे देता तो वो रात को रुक जाते । लेकिन ये कभी कभी ही होता बाकी दिन वह घर ही लौट जाते थे । लेकिन, उस दिन वो शिकारे से लौटने के बाद एक फूलों के बग़ीचे के मालिक के पास गए और थोड़ी बहुत हील-हुज्जत के बाद उससे बहुत कम दामों में तरह-तरह के फूल-कलियां खरीदने में कामयाब हो गए । फिर उन्होंने फूलों को घर लाकर उनकी मालाएं, गजरे बनाए और दूसरी सुबह शिकारे पर जाने से दो घंटे पहले ही घर से निकल जाते और उन्हें बाज़ार में बेच आते । ऐसे उनकी आमदनी भी थोड़ी बढ़ गई और गुलशन को भी बाहर निकलना नहीं पड़ा ।
हाँ, लेकिन उस दिन के बाद से अनवर अली की मेहनत काफी बढ़ गई थी । लेकिन उनके बच्चों की मासूम सूरत उन्हें थकने नहीं देती ।
आमदनी थोड़ी बढ़ी तो गुलशन ने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया । इस तरह जैसे-तैसे ही सही दोनों बच्चों की पढ़ाई शुरू हो गई । एजाज कुछ बड़ा हुआ तो उसने भी अपने बाप का हाथ बंटाना शुरू कर दिया, अब वही जाकर फूल लाता और मालाएं, गजरे बनाकर बेच आता था । फिर तैयार होकर स्कूल चला जाता । बचपन से ही अपने अब्बा के साथ हर काम करने की आदत ने उसे मेहनती और कर्मठ बना दिया ।
जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ती गई, वैसे-वैसे उसने घर की आधी से ज़्यादा ज़िम्मेदारी ख़ुद ही अपने कंधे पर ले ली थी । बाकी बच्चों की तरह उसने कभी किसी भी चीज़ के लिए ज़िद्द नहीं की थी । हमेशा माँ-बाप के हुक्म पर सिर झुका देने वाला बेहद फरमाबरदार बच्चा । कहते हैं ना कि, नेक औलाद भी सबसे बड़ी नेमत होती है । यह हमारे ही कर्मों पर निर्भर करता है कि, हमें क्या मिलना चाहिए और हम किस चीज़ को पाने के लायक हैं, इसलिए हमें वही मिलता है जिसके हम हक़दार होते हैं ना उससे ज़्यादा ना मिलता ना उससे कम मिलता है ।
इंटर के बाद एजाज को पढ़ाई छोड़नी पड़ी । क्योंकि उन दिनों अनवर अली की तबीयत ऐसी गड़बड़ाई कि, संभलने का नाम ही नहीं ले रही थी । उनके पास कोई जमा पूंजी तो थी नहीं कि, खर्चा चलता रहता ।
इलाज के खर्चे, घर के खर्चे, सब पूरे तो करने ही थे और यह सब फूलों को बेचकर पूरे नहीं हो सकते थे और एक-दो दिन की बात तो थी नहीं कि, कहीं से जुगाड़ कर लेता । इसलिए एजाज ने शिकारे का काम भी ख़ुद ही संभाल लिया ।
उस दिन से लेकर आज तक जब वह सताइस साल का नौजवान हो गया है वह शिकारे की मदद से अपने घर की सारी ज़िम्मेदारियां उठा रहा था । अनवर अली की तबीयत जब संभली तो वह भी अपने काम पर फिर से जाने लगे, फिर एजाज एक और शिकारा किराए पर लेकर चलाने लगा….
क्रमश: