लेखिका: शबनम मेहरोत्रा (कानपुर)
शब्दों में बसी संवेदनाएँ – लोकगीत से ग़ज़ल तक शबनम की रचनाएँ
Table Of Content
सारांश :
यह संग्रह शबनम मेहरोत्रा की रचनाओं का संगम है जिसमें एक लोकगीत और कई ग़ज़लें शामिल हैं। इन पंक्तियों में विरह, प्रेम, व्यथा, उम्मीद और जीवन के रंग बड़ी संवेदनशीलता से व्यक्त किए गए हैं। हर कविता पाठक के हृदय को छूती है और जीवन के अनुभवों को झकझोरती है।
आइए प्रेम, विरह और जीवन के अनुभवों को सजीव करती हुई इन कविताओं का आनंद लीजिए –
तोहरे बिन सूना (लोक गीत)
तोहरे बिन सूना दिल के हमार आँगना
आग लागे नौकरियां तोहार साजना
सावन भादो आश्विन कार्तिक
अगहन पौष भी बीत गया
तुम बिन सेजिया सूनी सूनी
मन की तरंगे रित गया
हमके काहे कराके लाईन गवना
आग लागे नौकरियां में तौर साजना
सास ससुर तो बहिरी, बहिरा
ननदी तो लालकी मिरचैया
बात बनावे जहर बूझवल
बनके रहे हमरी परछाइया
छोड़े पल भरको भिवो मेरा संगना
आग लगे नौकरिया में तोर साजना ।
माघ महीना अब आ आजाई
तोहर बिना न निंदिया आई
हमके छोड़ा चाहे नौकरिया
एक से करे होई जुदाई
तभी शबनम भी जाके देखेगी आइना
आग लगे निकरिया में तोर साजना ।
_______________________
घड़ी भर को चले आओ (गजल)
घड़ी भर को चले आओ लेलो हर खुशी मेरी
अगर बदले में चाहो ले लो सारी जिंदगी मेरी
मैं अपने दिल के हाथों हर घड़ी मजबूर रहती हूँ
खिलेंगे फूल कल गुलशन में लेलो वह कली मेरी
दुआएँ उनके दर से जाके मेरी लौट आई हैं
न जाने ठोकरें क्यों खा रही हैं बंदगी मेरी
हमारा हाल जैसा है अगर वह रह गया वैसा
हमारी जान ले लेगी किसी दिन आशकी मेरी
हमारे बाद शबनम याद ये दुनिया करेगी ही
किसी दिन रंग लाएगी जहाँ में शायरी मेरी
_______________________
हास लिखते हैं (गजल)
हास लिखते है परिहास लिखते हैं
विरह की रात मधुमास लिखते हैं
जिन्हें भारत की चौहद्दी नहीं मालूम
आज कल वो इतिहास लिखते हैं
न यति छंद का है ज्ञान कुछ भी
सिखाने मुझको अनुप्रास लिखते हैं
असर मौसम ने ऐसा ले आया हम
अपने घर को ही प्रवास कहते हैं
हमारे सामने जो घटती हैं नई घटनाएँ
हम उस के आस पास लिखते हैं
कुछ नहीं मिलेगा शायरी में शबनम
हम तो बस अपनी प्यास लिखते हैं
_______________________
कोई आता नहीं (गजल)
कोई आता नहीं अब ख्वाबों में आने वाला,
हमसे क्यों रूठ गया नींद उड़ाने वाला ।
मेरे कानों में किया करता था जो शरगोशी ,
अब कहाँ आता है वो रात जगाने वाला ।
उम्र भर साथ रहेगा ये वादा भी किया ,
पर नहीं लौटा मेरा साथ निभाने वाला ।
एक मेरे रूठने से होता था इतना बेकल ,
पलट के आया नहीं मुझको मनाने वाला ।
नित नए राग से बहलाता था मुझे शबनम ,
अब तो खामोश है वो गीत सुनाने वाला ॥
_______________________
जिनसे थी उम्मीद (गजल)
जिनसे थी उम्मीद , नही कोई आगे आए
बुरी परिस्थिति में देखे , अपने हुए पराए
लहू जिगर का दे , जिसको हमने पाला था
उसकी बारी आई , तो खोटी खरी सुनाए
अजब करिश्मा कुदरत का ,चाहे जो वो होगा
चाहे कोशिश कोई करले, या चाहे भरमाए
कृतिम सुख की खातिर , दौड़ भाग सब करते
ऊपर वाला देख देख कर ,मन ही मन मुस्काए
जिसने किसी से जीवन में , कोई आस न रखी
शबनम जीवन में उसके तो , कभी कष्ट न पाए