(마당을 나온 암탉, Madangeul Naon Amtak)
“स्वतंत्रता, मातृत्व और साहस की ऐसी कथा, जो हर उम्र के पाठक के हृदय को छू जाती है।”
पुस्तक समीक्षा: दिविक रमेश, नोएडा
इप्स्साक के द्वारा विसेल कि शिकार के बारे में कहने के उत्तर में उसने बताया कि जब वह भूखी होती है तो मजबूर होकर शिकार करती है। इप्स्साक को दया आ जाती है और वह बच्चों को, विसेल को बिना पता चले, छोड़ देती है। इप्स्साक विसेल को भोजन का एक अन्य स्रोत बताती है। विसेल भी कहती है –“ दूसरा भोजन मिल जाए तो मैं वादा करती हूँ कि तुम्हारे बच्चे को परेशान नहीं करूँगी। “ यहाँ रचनाकार स्थिति का इन खूबसूरत शब्दों में वर्ण करती है- इप्स्साक ने जाड़े और भूख से कांपते हुए बच्चों को ध्यान से देखा। जैसे ही उसे महसूस हुआ कि विसेल भी एक मजबूर माँ है, उसे उस पर दया आ गई।“
इस पड़ाव को कहानी का अंत कहा जा सकता था। लेकिन कथाकार ह्वांग सन मी बूढ़ी हो चुकी इप्स्साक की एक और बड़ी विशेषता को साकार करना चाहती थी। उसकी संवेदनशील मुक्ति चाहती थी।
इप्स्साक अपने बच्चे ‘हरा बाल’ को उड़ान भरते हुए देखती है और संतुष्ट है क्योंकि ‘एक ही इच्छा थी। अंडा सेकर चूजे का जन्म देखना। वह पूरी हो गई। जिंदगी कष्टमय रही लेकिन मैं बहुत खुश थी। इच्छा के कारन ही आज तक जिंदा हूँ। अब उड़ना चाहती हूँ। मैं भी हरा बाल की तरह फुर्र फुर्र उड़ना चाहती हूँ। बहुत दूर तक जाना चाहती हूँ।“ लेकिन सच ति यह हैकि अब वह न भाग सकती है और न भागने का उसके पास कारण ही बचा है। वह माँ के रूप में एक दूसरी माँ के लिए बलिदान करना चाहती है। व्ह विसेल को कहती है –“ अच्छा, मुझे खा जाओ। और खाकर अपने बच्चों का पेट भरो।“ अंतिम वाक्य है – “ बिलकुल बेजान पड़ी मुर्गी को मुँह में दबाए शिकारी विसेल मुश्किल से जा रही थी।“
ऊपर मैंने कहानी को सूत्र या कलेवर रूप में प्रस्तुत किया है। मूल रूप में पढ़ना पाठकों के लिए इसलिए जरूरी है कि लेखिका ने मानवीय मनोभावनाओं की बुनियाद पर या उनके परिप्रेक्ष्य में अपने मानवेतर पात्रों और उनकी दुनिया का बहुत ही सूक्ष्म अवलोकन करके व्यापक रूप से चित्रण किया है। यह चित्रण बहुत ही सजीव संवादों के रूप में भी हुआ है और कथा कहन के रूप में भी। एक-एक पंक्ति का महत्त्व है। खूबसूरती यह है कि जानवरों की दुनिया में भले ही कुछ मानव पात्र भी हैं लेकिन मानव पात्रों की भूमिका भले ही जानवरों से अपना लाभ उठाने की हो लेकिन जानवर उन्हें समझते जरूर हैं पर उनसे संवाद नहीं करते। वे आपस में ही संवाद करते हैं। अच्छी-बुरी हर तरह की भावना को आपस में ही प्रकट करते हैं। यह जरूर है कि हम पाठक उनकी भावनाओं में मनुष्योचित भावनाएँ भी, तुलनात्मक रूप में, खोजते चल सकते हैं।
हिंदी में अनुवाद की दृष्टि से भी इस कृति को सफल कहा जाएगा।
कह सकता हूँ कि यह कृति हर आयु के पाठक के लिए है।