“इतिहास की पीड़ा, प्रेम की गहराई और मन की संवेदनाओं का काव्यमय संगम।”
बटवारा
तन टूट गया मन रूठ गया
जब अपने मुझसे दूर हुए ।
रहते थे जो भाई माई बन कर
आज वो हमसे दूर हुए ।।
बट गया जिस्म दो भागो में
बट गया देश दो भागो में ।
बट गई सियासत नेताओं की
हिंदू मुस्लिम की जातो मे ।।
जो संग मे होली ईद मनाते थे
आज वही खून के प्यासे थे ।
मासूमो की चीखे गूँज उठी
पुरखों के आँगन छूट गए थे।।
उठ रही थी डोली संग अर्थी
जा रही थी बिटिया बिन मर्जी ।
रो रही थी सखिया सब उसकी
ये थी नेताओं की खुदगर्जी ।।
अपनो ने अपनो को लूट लिया
बस दर्द दिया बस दर्द दिया ।
बट गया देश दो भागों मे
सरहद की रेखा खीच दिया ।।
१९४७ की काली रातों मे
न जाने कितना कत्ल हुआ ।
दो भागों मे बट गया देश
भारत पाकिस्तान हुआ ।।
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” हमेशा बन के रहना तुम “
छुपा लो आँखो मे मुझको
पलक को बंद रखना तुम ।
कही निकल न जाऊं मै
अश्क़ को रोके रहना तुम ।।
ह्रदय की तेज धड़कन से
मेरी आवाज़ सुनना तुम ।
मेरे जीवन के मधुबन मे
हमेशा खिलती रहना तुम ।।
कही आँसू की बरखा मे
बह न जाऊँ आँखों से ।
कही जुल्फों की आँधी के
भवर मे फस न जाऊँ मैं ।।
छुपा के दिल के परतो मे
हमेशा बंद रखना तुम ।
निकल न जाऊँ दिल से मैं
हमेशा दिल मे रखना तुम।।
मेरे जीवन के हमराही
हमेशा बन के रहना तुम
कहीं खो न जाऊँ मैं
पकड़ कर हमको रखना तुम
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” प्रणय-निवेदन “
आपके आगमन से खुशी मिल गई
आँख मेरी खुली की खुली रह गई ।
दिल धडकन बड़ी श्वास लम्बी चली
आँख की पुतलियाँ भी ठगी रह गई ।।
आपको देखने को तरसती थी आँखे
आपको देख कर खुशी मिल गई ।
आप आया करो ये है हसरत मेरी
आपके आगमन से खुशी मिल गई ।।
तुम्हारे स्वागत को फैली है बाहे
दिल के गलीचो को मग मे बिछाया ।
पलकों का सुन्दर आसान बना कर
पलक सिंघासन तुमको बिठाया ।।
शब्दों के सुमन का हार बना कर
अपनी वाणी से तुमको पहनाया ।
स्नेह के व्यन्जन की थाल सजा कर
नैनो के हाथों से तुमको खिलाया।।
करो स्वीकार ये स्वागत हमारा
परिजन को चाकर बनाया तुम्हारा।
तुम्ही हो हमारे हम है तुम्हारे
तुम्ही से खिला है ये गुलशन हमारा ।।
-उत्तम कुमार तिवारी ” उत्तम ” , लखनऊ
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