“प्रकृति की महानता और इंसान की पीड़ा के बीच उम्मीद की एक किरण।”
पंकज शर्मा “तरुण “, पिपलिया मंडी (मध्य प्रदेश)
हिमालय
उत्तर में उत्तंग हिमालय,सर को ताने हुए खड़ा।
चूर चूर हो मिटा वही जो,आकर इससे मूढ़ लड़ा।।
जन ~जन के जीवन का रक्षक,सबका पालन कर्ता है।
खेतों में हरियाली लाता, यह रीते घर भरता है।।
रजत वसन करता यह धारण,जिससे सरिता बहती हैं।
गंगा, जमना, सरस्वती भी, जनक इसे ही कहती हैं।।
नर नारायण तप हैं करते,सिद्धि सभी पा जाते हैं।
सुबह ~सवेरे जल्दी उठ कर, वेद ऋचाएं गाते हैं।।
खग,मृग,भालू सुंदर पंछी,जिनकी शोभा न्यारी है।
मधुर सुरों में करते कलरव, देह यष्टी भी प्यारी है।।
शिव भी तप में लीन बिराजे,भोले बाबा कहलाते।
भटके प्राणी को बाबा जी,सही राह हैं दिखलाते।।
चाहो जो पावन निर्मल नद,कल~कल बहे सदा सरिता।
इन्हें करो मत मैली मानव,करे निवेदन यह कविता।।
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विषैली हवा
उम्मीदों का लिए पुलिंदा, घूम रहा हूं गली~गली।
भय से थर थर काँप रहा हूं, बड़ी विषैली हवा चली।।
तड़प रहा हूं अस्पताल में,बिन लिहाफ के बिस्तर पर।
राह देखता रहता हूं मैं,नजर मगर मुर्दा घर पर ।।
जेबें खाली हुई है अपनी,नकली मुझको दवा मिली।
भय से थर थर काँप रहा हूं,बड़ी विषैली हवा चली।।
पड़ी पास के रिक्त बेड पर,आह भर रही मानवता।
नहीं सुने कोई सब बहरे,गूंगी भूखी यह जनता।।
लाल हो रही सारी सड़कें,किसकी ऐसी जुबां चली।
भय से थर थर काँप रहा हूं, बड़ी विषैली हवा चली।।
मुफ्त मिला राशन खाता हूं,नींद चैन की सोता हूं।
ख्वाब हँसी सतरंगी देखूं,बीज खुशी के बोता हूं।।
बीज अंकुरित होगा जब भी,खिले आस की कली~ कली।
भय से थर~थर काँप रहा हूं, बड़ी विषैली हवा चली।।