“कुछ आवाज़ें इंसाफ़ तक पहुँचने का रास्ता बन जाती हैं।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…“और कोई साथ था?” माया का सवाल सीधा था।
“नहीं,” दोनों ने एक साथ कहा।
माया चुप रहीं, लेकिन अरविंद की गवाही उनके दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रही थी।
जांच आगे बढ़ी तो एक नाम बार-बार सामने आने लगा—नेहा शर्मा। शांत, साधारण और ज़रूरत से ज़्यादा चुप। माया ने उसे सामने बिठाया। “कल रात कहाँ थीं?”
“घर पर,” नेहा बोली, बिना आँख उठाए।
माया की नज़र उसके हाथ पर गई, जहाँ ताज़ी खरोंच साफ़ दिख रही थी।
“ये कैसे लगी?”
नेहा एक पल को रुकी। “दरवाज़े से,” उसने कहा।
माया मुस्कराईं, लेकिन उस मुस्कान में ठंडक थी। “दरवाज़े इतनी गहरी खरोंच नहीं देते।”
माया ने कॉलोनी की छतों का निरीक्षण किया। चारों ब्लॉक की छतें एक-दूसरे से जुड़ी थीं। एक इंसान आसानी से एक ब्लॉक से दूसरे में जा सकता था। “अगर कोई ऊपर से भागा हो,” उन्होंने खुद से कहा, “तो सीढ़ियों की आवाज़ सुने बिना।”
नेहा की कहानी धीरे-धीरे खुलने लगी। पाँच साल पहले राहुल खन्ना ने उसकी बहन काव्या से शादी का वादा किया था। भरोसा, रिश्ता, और फिर गर्भावस्था। जब बात समाज तक पहुँची, राहुल पीछे हट गया। बदनामी और अपमान ने काव्या को तोड़ दिया। उसने ज़हर खा लिया।
माया ने नेहा को सच के सामने बैठाया। “तुम ऊपर गई थीं,” उन्होंने कहा। “तुमने राहुल से अकेले में बात की। तुमने उससे हिसाब माँगा।”
नेहा की आँखों से आँसू बह निकले। “उसने मेरी बहन की ज़िंदगी छीन ली थी, मैडम। मैंने सिर्फ़ जवाब माँगा।”
“और जब उसने हँस दिया?”
नेहा की आवाज़ काँपने लगी। “तो मैंने उसका सिर दीवार पर दे मारा। एक बार… फिर दूसरी बार।”
कोर्ट में नेहा ने अपराध स्वीकार किया। जज ने कहा, “कानून हाथ में लेना अपराध है, लेकिन सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता।” सज़ा सुनाई गई, लेकिन शब्दों में कठोरता से ज़्यादा इंसाफ़ था।
माया कोर्ट से बाहर निकलीं और सीढ़ियों की ओर देखा। वही सीढ़ियाँ, वही आवाज़ें—लेकिन अब रहस्य नहीं था। अरविंद माथुर ने उस दिन समझ लिया कि कुछ आवाज़ें सिर्फ़ शोर नहीं होतीं, वे सच की दस्तक होती हैं।
कॉलोनी फिर से शांत हो गई थी। लेकिन हर आधी रात को, सीढ़ियों की खामोशी अब और गहरी लगती थी।
(काल्पनिक रचना)