“कुछ आवाज़ें इंसाफ़ तक पहुँचने का रास्ता बन जाती हैं।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
रात के ठीक बारह बजकर सत्रह मिनट थे। शांति विहार कॉलोनी में वैसी ही निस्तब्धता थी जैसी हर आधी रात को होती है। तीसरी मंज़िल पर रहने वाले अरविंद माथुर नींद और जागने के बीच झूल रहे थे, तभी सीढ़ियों से आती एक हल्की-सी आवाज़ ने उनकी तंद्रा तोड़ दी। पहले उन्हें लगा कि भ्रम होगा, लेकिन अगली ही पल आवाज़ साफ़ हो गई—टक… टक… चप्पलों की थाप।
अरविंद ने करवट बदली। अब उसी के साथ ठक… ठक… जूतों की भारी आवाज़ भी जुड़ गई थी। उन्होंने कान लगाकर गिनना शुरू किया—दो जोड़ी जूते, और एक जोड़ी चप्पल। “इतनी रात?” उन्होंने बुदबुदाया, “यहाँ कौन आ सकता है?” उनकी नज़र घड़ी पर गई और फिर दरवाज़े की ओर।
आवाज़ें ऊपर की ओर जा रही थीं। सीढ़ियों की हर मोड़ पर कदमों की गूंज साफ़ सुनाई दे रही थी। अरविंद समझ गए कि तीनों सीधे ऊपर वाले पेंटहाउस की तरफ़ बढ़ रहे हैं, जहाँ अकेले रहने वाला राहुल खन्ना रहता था। कुछ पल के लिए उनके मन में आया कि झाँक कर देखें, लेकिन फिर उन्होंने खुद को रोक लिया।
करीब दस मिनट बाद, वही सीढ़ियाँ फिर गूंजीं। इस बार आवाज़ें नीचे की ओर थीं। अरविंद का दिल ज़ोर से धड़क उठा, क्योंकि अब सिर्फ़ दो जोड़ी जूतों की आवाज़ थी। चप्पलों की थाप गायब थी। उन्होंने आँखें बंद कर दोबारा सुना, फिर यक़ीन हो गया—औरत नीचे नहीं आई थी।
सुबह होते-होते कॉलोनी की शांति चीख में बदल गई। चौथे ब्लॉक के पेंटहाउस से आती आवाज़ों ने सबको जगा दिया। दरवाज़ा खुला था और भीतर का दृश्य किसी को भी सन्न कर देने के लिए काफी था। राहुल खन्ना का शरीर बेडरूम के फर्श पर पड़ा था, सिर दीवार से टकराया हुआ, खून अब भी गीला था।
पुलिस के सायरन गूंजे तो अरविंद की रात की बेचैनी लौट आई। इंस्पेक्टर माया वर्मा ने कमरे में कदम रखते ही एक नज़र में बहुत कुछ पढ़ लिया। दीवार पर खून का फैलाव बता रहा था कि वार हथियार से नहीं, बल्कि ज़ोर से सिर पटक कर किया गया था। “यह गुस्से में की गई हत्या है,” उन्होंने धीमे से कहा।
नीचे उतरते ही अरविंद ने हिम्मत जुटाई। “मैडम… मैं कुछ बताना चाहता हूँ,” उन्होंने कहा। माया ने उनकी आँखों में डर और ज़िम्मेदारी दोनों देखे। जब अरविंद ने रात की आवाज़ों की बात बताई, तो माया की आँखें चमक उठीं। “आप निश्चित हैं कि एक औरत भी थी?”
“हाँ मैडम, चप्पलों की आवाज़ मैं कभी नहीं भूल सकता।”
पूछताछ में दो नाम सामने आए—अजय मल्होत्रा और विक्रम सेठ। दोनों ने माना कि वे राहुल से मिलने आए थे। अजय ने कुर्सी पर झुकते हुए कहा, “पैसों को लेकर बहस हुई, लेकिन हम लौट आए।” विक्रम ने तुरंत जोड़ा, “राहुल ज़िंदा था, मैडम। हमने उसे छोड़ा था।”
“और कोई साथ था?” माया का सवाल सीधा था।
क्रमश: