जहाँ प्रकृति मुस्कुराए, वहीं बसंत बस जाए।
सुशीला तिवारी , रायबरेली (उत्तर प्रदेश)
सारांश:
ये कविताएँ बसंत को केवल एक मौसम नहीं, बल्कि जीवन, प्रेम, प्रतीक्षा और प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक बनाती हैं।
सरसों के पीले खेत, आम की बौर, कोयल की कूक और बसंती हवाओं के साथ मन की उमंगें जाग उठती हैं।
बसंत यहाँ आता-जाता नहीं, बल्कि हर दिल में नई आशा और संवेदना छोड़ जाता है। आइए, इन हृदयस्पर्शी और मन के तारों को झंकृत करने वाली कविताओं का आनंद लें विस्तार से—
बसंती हवा
न समझना के हम ऐसे वैसे रहेंगे ।
बसंती हवा में ,,,,,,,,निखरते रहेंगे ।।
हम रहें न रहें,, ये जमाना रहेगा,
कुछ उजाले ,,,,कुछ अंधेरे रहेंगे ।1)
नशीली हवायें ये होती बसंती,
प्रकृति झूमती हम, बहकते रहेंगे ।2)
मिलो न मिलो ये है मर्जी तुम्हारी,
गली से तुम्हारी,,,,, गुजरते रहेंगे ।3)
हरे बौर आम के लगते सुहाने,
खेत सरसों के पीले, पीले रहेंगे। 4)
श्रृंगारित प्रकृति आज भी गाँव में,
खिले फूल टेसू,,,,,,, रंगीले रहेंगे ।5)
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ॠतु बसंती
सुना है ऋतु “बसंती” प्रेम दिल में जगाता है।
नव उमंगे साथ ले अपने द्वार मधुमास आता है।।
नया मौसम नये पत्ते दिलों में तार नव बजते ,
हुए मदहोश तरू पल्लव नये परिवेश में पलते,
खिला उपवन दिलों का मचलती प्यास लाता है।
नव उमंगें साथ ले अपने द्वार मधुमास आता है।।
सुहानी बूंद शबनम की कली व फूल भी लरजे,
सनम आयेगा मेरा मिलन को राह नित निरखे ,
भंवर बेचैन हो गाते मिलन की आस लाता है।
नव उमंगें साथ ले अपने द्वार मधुमास आता है।।
प्रकृति भी सज गई ऐसे जैसे सजे नयी दुल्हन,
तड़पती है वो ऐसे लगे जैसे कोई बिरहन ,
नया विस्वास ले बैठी समय ये खास आता है।
नव उमंगें साथ ले अपने द्वार मधुमास आता है।।
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फिर लौट आया बसंत
मन में उमंग उठी कल परसों से ,
खेत अब भरे होंगे फूल सरसो से,
नही आये जिनके गये परदेश कंत ,
देख सखी!फिर लौट आया बसंत ।
धूप नम हुई,स्वछंद हुआ आकाश ,
चहुं ओर बढ़े आन्नद और उल्लास ,
अब हो गया है शीत ऋतु का अंत ,
देख सखी! फिर लौट आया बसंत।
हरे बौर भर गई आम की अमराई ,
प्रकृति पल्लवित होकर मुस्कुराई ,
शीतल बयार बहे आसमान स्वछंद ,
देख सखी ! फिर लौट आया बसंत ।
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आना बसंत का
बोलती है कोयल जान के आना बसंत का ।
देखो सितम ये कि खुद न आना बसंत का ।।
गर इस तरह से पेड़ों को काटते रहोगे सब
कैसे आ पायेगा ,,,,,,,,,,,,, जमाना बसंत का ।
हवा चली बसंती,,,,, उडा ले गई सारे पात,
नये परिधान फिर,,, ,,,,,,, सजाना बसंत का।
आने की खबर मिलते ही ये भी चला आया ,
सूनी सी मेरी जीस्त में छा जाना बसंत का ।
सरसो के फूल पीले ,,,,,,,,,,,इतरायें झूमकर,
नव दिलों की धड़कन बन,,,जाना बसंत का ।
हम इश्क मुहब्बत में यूँ बरबाद हो गए अब ,
सब भूल गए गीत औ’,,,,,, गाना बसंत का ।
यूं ही लगा रहेगा आना और जाना बसंत का ,
जिंदगी रही तो देखेंगे ,फिर आना बसंत का।
कितना सुखद, प्यारा सुहाना लगता मौसम,
“सुशीला कहो कौन जो न दीवाना बसंत का।