( दिल बनाम दिमाग की जंग)
“जब भावनाएँ काबू से बाहर हों, तब प्यार ही एकमात्र इलाज होता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
रात के ठीक तीन बजे युवान अग्रवाल की नींद खुली।
या शायद वह सोया ही नहीं था।
कमरे की खिड़की से आती स्ट्रीटलाइट की पीली रोशनी दीवार पर अजीब-सी परछाइयाँ बना रही थी। युवान बिस्तर पर बैठा था, साँसें तेज़, हथेलियाँ पसीने से भीगी हुई। उसके कानों में फिर वही फुसफुसाहट गूँज रही थी।
“तू कमज़ोर है…”
“तू कभी सामान्य नहीं हो सकता…”
युवान ने सिर थाम लिया।
“चुप हो जाओ…” वह बुदबुदाया।
यह आवाज़ बाहर से नहीं आती थी। यह उसी के भीतर थी — उसके दिमाग के उस कोने से, जिसे वह वैज्ञानिक भाषा में Amygdala कहता था। वही हिस्सा जो डर, गुस्सा, प्रेम और पीड़ा को नियंत्रित करता है। लेकिन युवान के भीतर वही हिस्सा बेकाबू था।
दिन में वह एक सम्मानित न्यूरो-साइंटिस्ट था।
रिसर्च लैब में लोग उससे सीखते थे।
लेकिन रात में…
वह अपने ही दिमाग से हार जाता था।
उसे कॉलेज का वह दिन याद आ गया, जब एक साधारण अस्वीकृति ने उसे हिंसक बना दिया था। दीवार पर पड़े मुक्कों की आवाज़, टूटी हड्डी की चरमराहट — और फिर अजीब-सी राहत, जैसे दर्द ने भावनाओं को कुछ देर के लिए चुप करा दिया हो।
युवान जानता था —
समस्या यह नहीं थी कि वह क्या महसूस करता है।
समस्या यह थी कि वह कितना महसूस करता है।
और सबसे डरावनी बात यह थी कि
उसे नहीं पता था,
अगला भावनात्मक विस्फोट कब होगा।
क्रमश: