( दिल बनाम दिमाग की जंग)
“जब भावनाएँ काबू से बाहर हों, तब प्यार ही एकमात्र इलाज होता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…और सबसे डरावनी बात यह थी कि उसे नहीं पता था, अगला भावनात्मक विस्फोट कब होगा। वह भीतर से एक ऐसा ज्वालामुखी, जो हर छोटी भावनात्मक बात पर फट सकता था। हँसी से लेकर आँसू तक, डर से लेकर प्रेम तक — हर भावना उसके लिए एक तूफान थी। वह “Hyper Active Amygdala Disorder” से पीड़ित था — दिमाग के उस हिस्से की अतिसंवेदनशीलता से, जो भावनाओं को नियंत्रित करता है।
जहां सामान्य लोग किसी बात पर थोड़े देर दुखी होते हैं, वहीं युवान की पीड़ा हदें लांघ जाती थी। कॉलेज में किसी लड़की का ‘ना’ सुनकर वह दीवार पर घूंसे मारते-मारते अपने हाथ तक तोड़ चुका था। बचपन में माँ की डांट से इतना डर गया था कि पूरे दिन बिस्तर से नहीं निकला। और अब — एक वैज्ञानिक होकर, अपने ही दिमाग के इमोशनल सर्किट को समझते हुए भी, वह अपने आप को संभाल नहीं पा रहा था।
युवान के लिए विज्ञान ही उसका एकमात्र संबल था। लेकिन वह अकेला था। संबंधों से दूर, प्रेम से कोसों दूर। वह सोचता था कि वो किसी से प्यार करेगा तो शायद उस इंसान की हर बात उसे तोड़ देगी — क्योंकि उसकी भावनाएँ नियंत्रण में नहीं थीं। लेकिन फिर एक दिन, सब कुछ बदल गया।
दिल्ली में आयोजित एक इंटरडिसिप्लिनरी सेमिनार में, उसकी मुलाक़ात हुई रिया मलिक से — एक मनोविज्ञान की शोध छात्रा, जो वहां “इमोशनल इंटेलिजेंस इन इंडियन Families” पर पेपर प्रस्तुत कर रही थी।
रिया की आवाज़ में एक अजीब-सी गर्माहट थी — जैसे कोई अपने शब्दों से किसी का सिर सहला रहा हो। युवान, जो आमतौर पर लोगों की नज़रों से कतराता था, पहली बार किसी की आंखों में देर तक देखता रह गया। उसके भीतर कुछ कांप गया, कुछ ऐसा जो वह अब तक समझता आया था, पर कभी महसूस नहीं किया था।
“आपके चेहरे पर अजीब-सी बेचैनी है… कोई उलझन है?” रिया ने बड़े सीधेपन से पूछा।
क्रमश: