जहाँ हिन्दी की पीड़ा, प्रेम की चुप्पी और आत्मा का संघर्ष एक साथ बोलते हैं।
पल्लवी त्रिपाठी. दुर्ग
सारांश:
इन कविताओं में भाषा की अस्मिता, प्रेम की अधूरी वापसी, दोस्ती की गहराई और आत्मसंयम की पीड़ा एक साथ उभरती है। यह रचनाएँ व्यक्ति और समाज—दोनों के भीतर चल रहे संघर्षों का संवेदनशील दस्तावेज़ हैं। हर कविता एक सवाल छोड़ती है—हमने क्या खोया और क्या अब भी बचाया जा सकता है?आइए, इनका लुत्फ लें पूरे विस्तार से—
गुजरेगी स्याह रात
अम्मा के माथे चमकती थी बिंदी।
देश के माथे दमकती थी हिन्दी।।
बापूजी के गुजरने के बाद।
अम्मा ने पोंछ डाली बिंदी।।
अंग्रेजों के जाने के बाद।
कान्वेंट परस्तों ने छोड़ डाली हिन्दी।।
सिसकती है अम्मा
दरकती है हिन्दी।।
बेवा अम्मा से छीनी घर की सत्ता।
आजाद देश में अंग्रेजी ने छीनी सत्ता ।।
राष्ट्रभाषा के मुगालते पर सीना चौडा।
उधर देखो अंग्रेजी घोडा दौडता ।।
दूसरी भाषा में शिक्षा, बापू ने आत्महत्या बताया।
अंग्रेजी के अभाव ने हमें बेकार गंवार ठहराया।।
बापू ने इसे पर्ने दर्जे का राष्ट्रीय संकट करारा।
पर अंग्रेजों के रहनुमाओं को समझ में नहीं आया इशारा ।।
परदेशी तो पराया था चला गया।
अपना आया पर देश छला गया।।
देखों छाती छलनी है हिन्दी की।
मेरी आत्मा धिक्कारती जिम्में की।।
हिन्दी भी अच्छी-अंग्रेजी भी अच्छी ।
बुरे हैं तो मेरे जज्बात।।
जो नहीं करते हिन्दी का ख्यालात।।।
छोटी लगती है उनको यह बात।
पर एक दिन गुजरेगी स्याह रात ।।
मेरा दिल कहता यह बात।
तुम्हारे क्या है ख्यालात ।।
विजूदा बयां करता इतिहास ।
तुम्हें भी होगा अहसास ।।
हिन्दी रोती-बिखलती आस-पास ।
तुम्हें भी होगा अभास ।।
अम्मा के माथे फबती थी बिंदी ।
देश के माथे दमकती थी हिन्दी ।।
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नहीं आए
नहीं लौट सकती मैं
उस गली में
जहां संग तेरे
हाथ में धरकर हाथ
मैंने अपने बेचैन दिल को
आहिस्ता चलना सिखाया था
नहीं लौट सकती मैं
उस गाने की उन पंक्तियों में
जिसमें अनजाने कवि
की तरह तेरा नाम छुपाया था
नहीं अब तो बिल्कुल नहीं
मैं बिल्कुल भी नहीं लौट सकती
तुम्हारे झूठे कसमें वादों में
वो हमेशा सी भीगी शामो में
जिनमें बस नहीं था मेरा कभी
पर देखो तो ज़रा इस जिद्दी मन को
इसे रोककर भी मैं
अधमरी सी पड़ी हूँ
आज भी उस बिस्तर पर
जहां तुम कभी आए ही नहीं।
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कोई अपना सा
और फिर कोई क्यूं अपना काम
छोड़कर मेरी बातों पे ध्यान दे
क्यों कुछ पल मेरे दर्द को बांटे
मेरी खुशियों को दुगुना करे
क्यूं मेरे संग हंसी ठिठोली करे
गाएं कुछ गीत एकाकीपन के
परिवार से परे एक परिवार बनाएं
और कहे मुझे अपना, जब मैं हूँ
उनसे हर मामले में जुदा
इस क्यों के परे के जीवन में
रस भरकर वो फिर हो ले
अपने रास्ते और मैं अपने रास्ते
जैसे ये कदम कभी
रास्ता लांघे ही ना हो।
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दोस्ती
प्यार के नहीं दोस्ती
के फसानों में खोज
रहीं हूँ खुदको कि
दोस्ती प्यार से अज़ीज़
और गहरी है। इसमें
मज़ा, मौज-मस्ती
दुख-दर्द-पीड़ा सब
बांटकर, मिलकर
हर पल को जीने का
गुड़ है पर सच्ची दोस्ती
सब के नसीब है कहाँ?
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खुदको रोक लिया
तुझे पाने के खयाल ने आकर इल्तेजा तो किया
फिर से डूबने के डर, अबकी पार पाने की चाहत ने रोक लिया
रोज़ मसरूफ़ होती हूँ तंग करते तो है यादें साथ बीतें पल की
खुदको कुछ बना लूँ, पा लूँ एक गज ज़मीं खुद की, खयाल ने रोक लिया
क्या होता अगर हम साथ होते, ये अगर-मगर छोड़कर
पर बिन बात पे मायूस क्यूं हो कहकर खुदको रोक लिया
हर बात पे हार- जीत का फैसला करते हो, शुरुवात करते ही नहीं
उसी जोश-ओ-खरोश में आपा खोना याद कर खुदको रोक लिया