“जिस दर्द को दुनिया ने अनदेखा किया… उसी दर्द ने सीता को अजेय बना दिया।”
आश हम्द, पटना (बिहार)
सारांश :
एक मासूम पत्नी, जो हर अत्याचार सहकर भी चुप रही… पर अपनी बेटी पर उठा हाथ उसके जीवन की सबसे बड़ी क्रांति बन गया। दहकते अतीत, टूटती उम्मीदों और अनकहे जख़्मों के बीच—सीता अकेले दो बच्चों के साथ एक अनजान शहर में नई लड़ाई शुरू करती है। सालों की गुमनाम तपस्या के बाद जब वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती है, तो सस्पेंस यही है—क्या वह अतीत को माफ करेगी या उसी की राख पर अपनी नई दुनिया बनाएगी? आइए, विस्तार से जानें इस भावनात्मक पारिवारिक कहानी के जरिए—
…“ क्या हुआ सीता ? मेरी बहन बता तो मुझे ? देख मुझे बहुत घबराहट हो रही है ।”
लेकिन सीता बस रोती रही। मोहित उसे रेस्टोरेंट में ले गया, उसे पानी पिलाया, शांत किया, बच्चों को भी नाश्ता कराया, सीता को भी ज़बरदस्ती थोड़ा सा खिलाया, फिर उन्हें लेकर अपने रूम पर आ गया जहाँ वह अपने दो और साथियों के साथ रूम शेयर करता था। अभी वो दोनों ड्यूटी पर थे मोहित ने आज की छुट्टी कर ली थी।
सीता ने अपनी सारी व्यवथा मोहित को कह सुनाई और कहा कि – अब वह कभी उस घर में वापस नहीं जाएगी। मोहित ने उसकी बात मान ली और उसके रहने के लिए एक रूम किराया पर दिलवा दिया। मोहित ने चाहा के राम के परिवार से, राम से, वह बात करें लेकिन सीता ने मना कर दिया और खुदु ही ख़ुद के और अपने बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष शुरू कर दी।
पढ़ाई इतनी की नहीं थी उसने कि कहीं कोई नौकरी मिल पाती। शुरुआत में सीता एक काग़ज़ के पैकेट बनाने का काम करने लगी। लेकिन उससे बस पेट ही मुश्किल से भर पता था फिर उसने एक कारखाने में काम करना शुरू किया। वहाँ बटन टांकने का काम उसे मिला, इसमें थोड़ी आमदनी बढ़ी तो उसने बचत करना शुरू किया और उस बचे हुए पैसे से एक सिलाई मशीन ख़रीद ली। अब कारखाने से आने के बाद वो उन औरतों के कपड़े सिलने लगी जो कारखाने में उसके साथ काम करती थी। सीता कुछ कम पैसों में ही उनके कपड़े बेहतर डिज़ाइन में सिल देती थी, इसलिए वह सभी उससे ही कपड़े सिलवाने लगी थीं।
फिर दो-तीन सालों की मेहनत से ही सीता ने तीन-चार सिलाई मशीन ख़रीद लिए और एक बड़ी सी जगह देखकर किराए पर ले लिया और सिलाई सेंटर खोल ली। सीता की मेहनत रंग लाई और कुछ उसकी किस्मत ने भी उसका साथ दिया, जिसकी बदौलत सीता ने तीन सालों में ही दस साल की मेहनत कर ली थी और छोटा ही सही अपना घर ले लिया, बच्चों को अच्छे स्कूलों में दाखिला दिलवाया, सब कुछ उसने अपने दम पर किया। मोहित भी क़दम-क़दम पर उसके साथ खड़ा रहा था।
इन छः सालों में सीता राम से फोन के माध्यम से संपर्क में रही। लेकिन जब तक उसने अपनी मंजिल नहीं पा ली राम को अपना पता ठिकाना नहीं बताया, ना मोहित को बताने दिया। जब उसके रहने का ठिकाना हो गया, आमदनी का रास्ता मिल गया, तब सीता राम को भी पटना ही बुला लिया। यहीं एक प्राइवेट कंपनी में मोहित ने उसे भी नौकरी दिलवा दी। राम के सौतेले परिवार ने उसके पिताजी के देहांत के बाद उनकी जायदाद में से एक रुपया भी राम को नहीं दिया फिर भी राम को या सीता को कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि सीता की मेहनत से उनकी सारी कमी पूरी हो गई थी।
सीता ने अपने ख़्वाबों का जहां पा लिया था।
उसके मायके वाले, ससुराल वाले आज सभी उसकी कामयाबी पर रश्क कर रहे थे…..
(काल्पनिक रचना)