“जिस दर्द को दुनिया ने अनदेखा किया… उसी दर्द ने सीता को अजेय बना दिया।”
आश हम्द, पटना (बिहार)
सारांश :
एक मासूम पत्नी, जो हर अत्याचार सहकर भी चुप रही… पर अपनी बेटी पर उठा हाथ उसके जीवन की सबसे बड़ी क्रांति बन गया। दहकते अतीत, टूटती उम्मीदों और अनकहे जख़्मों के बीच—सीता अकेले दो बच्चों के साथ एक अनजान शहर में नई लड़ाई शुरू करती है। सालों की गुमनाम तपस्या के बाद जब वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती है, तो सस्पेंस यही है—क्या वह अतीत को माफ करेगी या उसी की राख पर अपनी नई दुनिया बनाएगी? आइए, विस्तार से जानें इस भावनात्मक पारिवारिक कहानी के जरिए—
…“ क्या हुआ बेटा ! क्यों रो रही हो ऐसे ?”
“ मम्मी ! मुझे बुआ ने बहुत ज़ोर से मारा है ।”
रौशनी अपनी तोतली ज़ुबान में बताने लगी, तभी उसकी ननद किचन में दाख़िल हुई –
“ अरे बाप रे ! यह छटांग भर की लड़की मेरी शिकायत करने आई है, ठहर जा तुझे बताती हूँ !”
कहती हुई कामिनी उसे मारने को जैसे आगे बढ़ी सीता सामने आकर खड़ी हो गई।
“ तेरी यह मजाल ! तू मुझे रोकेगी ?”
कहती हुई वो सीता को मारने को हुई तो आज पता नहीं कैसे सीता में इतनी हिम्मत आ गई कि उसने उसका हाथ पकड़कर झटक दिया और गुस्से से गुर्राई –
“ खबरदार ! जो मेरी बेटी कुछ छुआ भी तो, हाथ तोड़ दूंगी। तुम लोगों की बातें सुनती हूँ, मार खाती हूँ, इसका मतलब यह नहीं है कि मेरे मुँह में ज़ुबान नहीं है या मेरे हाथ ठूंठ पड़ गए हैं। लिहाज़ कर रही हूँ तो तुम लोग भी लिहाज़ में रहो और मेरी बर्दाश्त को आज़माओ मत ।”
कहते हुए सीता रौशनी को लेकर वहाँ से चली गई। कमरे में आकर वह रोने लगी कि – क्या मेरी बेटी की ज़िंदगी भी मेरी तरह लोगों की बातें सुनते, मार खाते गुज़रेगी ! राम तो पता नहीं क्यों कुछ नहीं कहते, उल्टा मुझे ही सब्र करने की सलाह देते हैं। लेकिन अब बस ! बहुत हो गया ! बहुत सह लिया मैंने ख़ुद पर, लेकिन अपने बच्चों पर नहीं होने दूंगी यह ज़ुल्म !
सीता दृढ़ निश्चय करके दोनों बच्चों को सीने से लगाए रो पड़ी।
दूसरी सुबह वो उठी बच्चों को तैयार किया, ख़ुद भी तैयार हुई और कुछ ज़रूरी सामान लेकर बिना किसी को कुछ बताएं, सबके उठने से पहले ही घर से निकल गई। बस स्टैंड पहुँचकर वो पटना जाने वाली बस में बैठ गई। बस के गाँव से निकलने तक सीता डर से अंदर ही अंदर कांप रही थी, अगर किसी ने उसे देख लिया तो फिर वह कभी यहाँ से निकल नहीं सकती थी, किसी तरह ये दो घंटे का सफ़र पूरा हुआ और पटना पहुँच गए वो लोग।
सबसे पहले उसने फोनबूथ से अपने बड़े भाई मोहित को कॉल करके बुलाया, जो पटना में ही जॉब करते थे। बहन की रोती आवाज़ और पटना में उसकी मौजूदगी का सुनकर मोहित बहुत घबरा गया। वह जल्दी से रिक्शा लेकर सीता की बताई हुई जगह पर पहुँच गया। भाई को देखते ही सीता फफक कर रो पड़ी।
“ क्या हुआ सीता ? मेरी बहन बता तो मुझे ? देख मुझे बहुत घबराहट हो रही है ।”
क्रमश: