“जिस दर्द को दुनिया ने अनदेखा किया… उसी दर्द ने सीता को अजेय बना दिया।”
आश हम्द, पटना (बिहार)
सारांश :
एक मासूम पत्नी, जो हर अत्याचार सहकर भी चुप रही… पर अपनी बेटी पर उठा हाथ उसके जीवन की सबसे बड़ी क्रांति बन गया। दहकते अतीत, टूटती उम्मीदों और अनकहे जख़्मों के बीच—सीता अकेले दो बच्चों के साथ एक अनजान शहर में नई लड़ाई शुरू करती है। सालों की गुमनाम तपस्या के बाद जब वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती है, तो सस्पेंस यही है—क्या वह अतीत को माफ करेगी या उसी की राख पर अपनी नई दुनिया बनाएगी? आइए, विस्तार से जानें इस भावनात्मक पारिवारिक कहानी के जरिए—
बिना संघर्ष के मिलती कहां है मंज़िल….
कोशिशों से ही आसान होती है मुश्किल….
चाय के दो कप ट्रे में सजाए सीता कमरे में दाख़िल हुई। लेकिन यह क्या ! राम तो अभी भी सो रहा था। सीता ने धीरे से कंबल खींच लिया, राम ने कसमसाकर आँखें खोलकर देखा सामने सीता को चाय लिए मुस्कुराते हुए खड़े पाया तो फिर से आँखें मूंदते हुए बोला –
“ सीतू यार ! बस थोड़ी देर और सोने दो !”
और साथ कंबल दोबारा ओढ़ने लगा। सीता ने ट्रे टेबल पर रखी और कंबल खींचते हुए बोली –
“ उठ जाओ राम ! अब मैं एक मिनट भी तुम्हें सोता हुआ बर्दाश्त नहीं करूंगी !”
सीता के चेहरे से मुस्कान ग़ायब होते देखा तो राम उठकर बैठ गया। अब वह अपनी प्यारी पत्नी को नाराज़ तो हरगिज़ नहीं कर सकता था।
“ ओ मेरी गुलाबो ! इतनी जल्दी मुँह ना फुलाया करो, लो ! मैं उठ गया। चलो चाय दो मेरी !”
कहते हुए राम उठकर बेडसाइड से टेक लगाकर बैठते हुए बोला। सीता राम को कप पकड़ाकर अपना कप लिए बेड के कोने पर बैठकर चाय पीने लगी। तभी दरवाज़े की डोरबेल बज उठी।
“ इतनी सुबह-सुबह कौन आ गया ?”
“ मैं देखता हूँ ।”
राम करता हुआ दरवाज़े की ओर चल दिया और सीता किचन में चली आई और फिर से चाय का पानी चढ़ा दिया। सीता किचन से बाहर आई तो देखा कि मोहित भैया आए हुए हैं। मोहित सीता के बड़े भाई थे और सीता से उन्हें कुछ ज़्यादा ही प्यार था। वह अक्सर उससे मिलने आते रहते थे। सीता उनको बड़ा भाई ही नहीं पिता समान मानती थी। और मानती भी क्यों नहीं आज अगर उसकी ज़िंदगी में यह सुख के दिन आए हैं तो सब मोहित भैया की वजह से। जब राम और सीता चारों तरफ से मुसीबत से घिरे हुए थे, हर ओर अंधकार ही अंधकार दिख रहा था। तब मोहित ही रौशनी का फरिश्ता बनकर आया था और उनकी ज़िंदगी में बिखरे अंधेरे को मिटा दिया था।
सीता पता नहीं खड़ी-खड़ी यही सब कब तक सोचती रहती कि मोहित ने आकर उसके कंधे को छुआ –
“ क्या हुआ मेरी बहन ! किन ख़्यालों में गुम हो ?”
क्रमश: