“जिस दर्द को दुनिया ने अनदेखा किया… उसी दर्द ने सीता को अजेय बना दिया।”
आश हम्द, पटना (बिहार)
सारांश :
एक मासूम पत्नी, जो हर अत्याचार सहकर भी चुप रही… पर अपनी बेटी पर उठा हाथ उसके जीवन की सबसे बड़ी क्रांति बन गया। दहकते अतीत, टूटती उम्मीदों और अनकहे जख़्मों के बीच—सीता अकेले दो बच्चों के साथ एक अनजान शहर में नई लड़ाई शुरू करती है। सालों की गुमनाम तपस्या के बाद जब वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती है, तो सस्पेंस यही है—क्या वह अतीत को माफ करेगी या उसी की राख पर अपनी नई दुनिया बनाएगी? आइए, विस्तार से जानें इस भावनात्मक पारिवारिक कहानी के जरिए—
…“ क्या हुआ मेरी बहन ! किन ख़्यालों में गुम हो ?”
सीता झट से कल्पनाओं के सागर से निकल आईं और मुस्कुरा दी।
“ सोच रही हूँ भैया, अगर आप नहीं होते तो मेरी ज़िंदगी में तो मेरा क्या होता !”
“ अरे, यह सब क्या सोचती रहती है तू ! वह दिन अब वक्त बीत गए अब उन्हें याद करने से क्या फायदा ?”
दिन और वक्त गुजर जाते हैं लेकिन उस वक्त के एहसास-ओ-जज़्बात सब कुछ वैसे का वैसे ही रहता है। सीता यह कहना चाहती थी लेकिन सिर्फ़ इतना ही बोली –
“ जी भाई, अब कोई फ़ायदा नहीं है ये सब याद करने का, अच्छा बताइए क्या खाएंगे ? मैं बना लेती हूँ ।”
“ मैं कुछ नहीं खाऊंगा, बस चाय पिला दो अच्छी सी फिर निकलूंगा। मैं बस तुम दोनों से मिलने आ गया था ।”
मोहित ने चाय की फरमाइश की और सोफे पर बैठ गया। राम भी हाथ मुंह धोकर वहीं आकर बैठ गया और दोनों बातों में लग गए।
सीता चाय बनाने चल दी और उसकी अतीत की परछाईयां उसके पीछे-पीछे हो ली….. सीता ने लाख झटकना चाहा लेकिन अतीत ने उसे अपनी आगोश में ले ही लिया…..
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अपनी ख़ूबसूरत पलकों पर हज़ारों सपने सजाए सीता आज राम के आँगन में उतरी चाँदनी बिखेर रही थी। अपनी मंद-मद मुस्कान से पूरे माहौल को खुशनुमा बनाए हुए थी। शादी की अनगिनत रस्मों के बाद सीता को उसके कमरे में पहुँचा दिया गया। अब वह राम का इंतज़ार कर रही थी, लेकिन पता नहीं क्यों आधी रात के बाद भी राम नहीं आया था। इंतज़ार करते-करते ना जाने कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला। उसकी आँख राम के पुकारने पर खुली।
“ सीता….!”
“ ज..जी…जी..! आप कब आए राम ? कहाँ चले गए थे ?”
सीता ने उठकर बैठते हुए पूछा।
“ वह मैं माँ के काम से गया था। बहुत ज़रूरी था इसलिए जाना पड़ा, मैं माफ़ी चाहता हूँ तुमसे ।”
राम ने शर्मिंदा होते हुए कहा।
फिर अगले कुछ हफ़्ते नॉर्मल गुज़रे। राम दिल्ली के एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता था और वह वहाँ अकेला ही रहता था। उसकी फैमिली गाँव में रहती थी और अब सीता को भी गाँव में ही राम की फैमिली के साथ ही रहना था। राम ने एक महीने की छुट्टी ली थी शादी के लिए, जो अब ख़त्म हो गई थी, और कल राम को हर हाल में दिल्ली के लिए निकलना था। राम के चले जाने का सोचकर ही सीता बहुत उदास हो रही थी। राम भी इस बार बूझे-बुझे मन से जाने की तैयारी कर रहा था।
सीता को यहाँ छोड़कर जाना राम के लिए भी आसान नहीं था लेकिन रोजी-रोटी के लिए निकलना ही था, और कोई चारा भी नहीं था।
फिर राम चला गया और सीता भी घर के कामों में लग गई।
राम के जाने के दूसरे दिन से ही सास ससुर, नंद, देवर सभी का रवय्या सीता के प्रति बदल से गया। क्यों ! बहुत गौर करने पर भी सीता कुछ समझ ना सकी कि आख़िर अचानक सबको क्या हो गया ! उसकी सास ने घर के सारे काम उसके हवाले कर दिए, लेकिन जब वह खाना पकाने जाती तो अनाज वह ख़ुद नाप-तौल कर देती। और जो अगर कभी किसी को खाना कम पड़ जाता तो सारा इल्ज़ाम सीता को देती और कहती – सारा यही खा गई, बहुत खाती है। फिर इन्हीं सब बातों को मुद्दा बनाकर उसे ज़लील करती रहती। पहले छोटे-मोटे इल्ज़ाम लगाना शुरू किया, फिर सब मिलकर उस की ज़रा-ज़रा सी बात पर बेइज्जती करने लगे। वह चुपचाप सब कुछ सहती रही क्योंकि राम उसके साथ नहीं था और वह अपने मायके वालों को भी परेशान नहीं करना चाहती थी। राम भी कुछ दिनों के लिए आता और उसके आते ही जैसे घर का कायापलपट हो जात। सबका बर्ताव भी ठीक हो जाता। सब हँसी-ख़ुशी रहने लगते, सीता फिर से जी उठती, वो प्रार्थना करने लगती कि ऐसे ही हमेशा सब रहते तो कितना अच्छा होता। सीता चाहती थी कि वह राम को अपने साथ होने वाले बर्ताव की कहानी सुनाएं… लेकिन उसे मौक़ा ही नहीं पाता था।
एक दिन शाम को जब राम छत पर अकेला बैठा था। सीता चाय के दो कप उठाए उसके पास आकर बैठ गई। “ राम, तुम्हें पता है मैंने यह इतने सारे दिन रात तुम्हारे बगैर किस तरह से गुज़ारे हैं ?”
क्रमश: