हर शेर में वतन की महक, हर मिसरा में दिल की सच्चाई।
आश हम्द, पटना
सारांश:
इन रचनाओं में वतन के प्रति अटूट प्रेम, आत्मा की बेचैन तलाश और रिश्तों की सच्ची गहराइयाँ एक साथ धड़कती हैं। हर मिसरा एक एहसास है—जहाँ वफ़ा, दर्द और उम्मीद की आवाज़ गूंजती है। आश हम्द’ की कलम भावनाओं को शब्दों में नहीं, रूह में उतार देती है।आइए, विस्तार से पढ़ें दिल को छू लेने वाली इन प्रेरक रचनाओं को—
वतन की शान
मेरे लहू की हर बूँद में तेरा नूर बसता है,
तेरी मिट्टी की ख़ुशबू से ही मेरा वजूद महकता है।
जहाँ तिरंगा लहराए, वही मेरा आसमान है,
तेरे लिए जीना-मरना ही मेरा सम्मान है।
सरहदों पे खड़े सिपाही जब शहादत ओढ़ लेते हैं,
अपनी जान देकर भी तुझे सलाम कर जाते हैं।
उनकी आँखों की चमक है वफ़ा की तफ़सीर,
उनकी साँसों में ही लिखी है मोहब्बत की तशरीह।
माँ की दुआ, पिता की उम्मीद, बहन का अरमान,
सब कुछ तू ही है ऐ वतन, तू ही है मेरी जान।
तेरी गलियों में गूंजे मेरी ज़िंदगी का तराना,
भारत माँ, तू है मेरा पहला और आख़िरी ठिकाना।
क़सम है इस ज़मीन की, क़सम है इस आसमान की,
तेरी इज़्ज़त बचाऊँगा हर हाल में आहूति दे जान की।
मेरे होंठों पे लम्हा-लम्हा यही पैग़ाम रहे,
“जय हिन्द” का नारा ही मेरा ईमान रहे।
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तलाश
तलाश में हूँ मैं हर एक सवाल की तरह।
गुज़र रही हूँ किसी माह-ओ-साल की तरह।
ना कोई मंज़िल, ना कोई कारवां है मेरा,
चली हूँ मैं भी, मगर इक ख़्याल की तरह।
कभी वो चेहरा, कभी वो ख़्वाब, वो लम्हें,
हर इक फ़साना है, जैसे मलाल की तरह।
यह किस सदा ने पुकारा है फिर मुझे यूं,
कि…..गूंजती है मेरी रूह क़ाल की तरह।
न जाने किसकी मुझे ज़ुस्तज़ू है अब तक,
कि दिल में चुभती है वह इक ताल की तरह।
मैं अपने साँसों से भी पूछती रही हूँ बरसों,
कि तू भी चलती है क्यों इक सवाल की तरह।
सराब राहों में मिलते रहे हर रोज़ बहाने से,
मगर….न निकली हक़ीक़त कमाल की तरह।
जिन्हें समझती रही मैं निशान मंज़िल के,
वो मोड़ निकले फ़क़त धोखे ढाल की तरह।
यक़ीन, ख़्वाब, तमन्ना, तुम्हारे वादे सब,
बनते जा रहे हैं ज़ख़्म मेरे, विसाल की तरह।
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रिश्तों की बुनियाद
हर एक रिश्ता फ़क़त अल्फ़ाज़ से तो बनता नहीं।
दिल से दिल तक सिलसिला जज़्बात से चलता नहीं।
जो भरोसे के चिराग़ से भी ना हो रौशन कभी,
ऐसा रिश्ता सिर्फ़ कुछ हालात से तो बनता नहीं।
एक तबस्सुब, एक नज़र, एक लम्हा ख़ामोशी का,
यह वो जुगनू है जो रात-ओ-रात निकलता नहीं।
रिश्ते मिट जाते हैं, अगर नींव में दरार पड़ जाए,
घर मोहब्ब्त का कभी माली-औकात से बनता नहीं।
ज़ख़्म देना हो अगर, तो दूर रहना ही बेहतर है,
साथ हर बार तल्ख़ बात से ही तो… छूटता नहीं।
जो समझते हैं सिफ़र लफ़्ज़ों की तहरीरें सारी,
उनसे रिश्ता बस किताबों की बात से बनता नहीं।
हर तबस्सुम की तह में दर्द सा भी शामिल रहा,
हर अश्क़ किसी शर्त पर बरसात में भीगता नहीं।
दिखावे की नहीं है ये कोई तिजारत ‘आश ‘
रिश्ता दिल का है, किसी सौगात से बनता नहीं
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Waah!!