सुनीता मिश्रा, देहरादून
कभी-कभी एक साधारण यात्रा भी ईश्वर की परीक्षा बन जाती है!
सारांश:
शादी की सालगिरह पर अयोध्या पहुंचे दंपती को रामलला दर्शन के बाद एक अद्भुत अनुभव हुआ, जब दो रहस्यमयी साधु भोजन मांगते हुए उनके जीवन में आए। साधुओं की शर्तें, उनके साथ की गई पूरी यात्रा और अंत में उनका चित्र तक गायब हो जाना – ये सब किसी ईश्वरीय लीला से कम नहीं लगा। यह घटना उनके लिए आस्था, विश्वास और सकारात्मक सोच की परीक्षा बन गई, जिसने उन्हें जीवनभर की सबसे खूबसूरत यादें दे दीं। आइए जानें इस दिलचस्प और रहस्यमय अनुभव के आखिरी चैप्टर को विस्तार से—
तभी पति के साथ उन दोनों साधुओं को वापस लौटते हुए देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गई।
“क्या हुआ ???” इस बार मैं थोड़ी परेशान होते हुए प्रमोद जी से इशारों से ही पूछी थी। वह मेरे पास आकर बोले इनका कहना है कि “यह सिर्फ हरि या नारायण नाम के भोजनालय में ही भोजन करेंगे।”
फिर प्रमोद जी उन साधु के सामने जाकर बोले क्या आपको किसी भोजनालय का पता है अगर हो तो आप वहां चलिए कृपया।
हाॅं में सर हिलाते हुए वह साधु वापस हनुमानगढ़ी मंदिर के तरफ मुड़कर चलने लगे और मंदिर के पास में ही एक भोजनालय था जिसमें तीर्थ यात्रियों की भीड़ लगी हुई थी ,, बिल्कुल साधारण सा भोजनालय जिसका नाम था-
“हरि नारायण भोजनालय!!”
हमने कहा – अब आप लोगों को जो भी खाना है उसमें जाकर खा सकते हैं। फिर उन्होंने दो थाली लिए और खाने में मग्न हो गए। हमने काउंटर पर उनके खाने का बिल चुकाने के बाद एक नजर मंदिर की तरफ देखा।
भीड़ थोड़ी कम हो चुकी थी और फिर हम हनुमान जी के दर्शन के लिए मंदिर के लाइन में लग गए।
भीड़ अभी भी बहुत थी लेकिन तब भी दर्शन बहुत ही सहज और सुंदर ढंग से हो गया। यह एक बहुत ही खूबसूरत घटना थी। उस समय सब कुछ सामान्य लगा था किंतु अब जब इसके बारे में सोचती हु तो लगता है, यह कहीं से भी सामान्य घटना नहीं थी।
“मैं ईश्वर में बहुत विश्वास करती हूॅं किंतु मैं अंधविश्वासी नहीं हूॅं।”
फिर भी मैं एक अदृश्य डोर में बंधी अपने पति और उन साधुओं के पीछे-पीछे चली जा रही थीं।
मैं उन साधुओं से हमेशा थोड़ी दूरी बनाकर चल रही थी । जाने क्यों मुझे डर लग रहा था कहीं किसी बात से गुस्सा होकर वह भोजन करने से इंकार न कर दें ; किंतु जब वह भोजन करने लगे थे तब मैं अपने मोबाइल से चुपके से उनका एक फोटो ले ली थी , क्योंकि मुझे पता था मैं इस पर एक आलेख जरूर लिखूंगी।
घर आकर मैंने उस फोटो को बहुत ढूंढा लेकिन उन दोनों साधुओं का फोटो मुझे नहीं मिला।
मुझे बहुत ज्यादा आश्चर्य हुआ था। शायद यह हम दोनों पति-पत्नी की परीक्षा थी हमें पता नहीं इस परीक्षा में हम पास कर पाए या नहीं,
किंतु इस घटना ने मन में विश्वास, श्रद्धा और भक्ति की अमिट छाप छोड़ दी। जो अब मेरे संपूर्ण जीवन की सबसे खूबसूरत यात्रा और यादें बन गई हैं।
कहने का मतलब यह है जहां ठगी न हो, स्वार्थ न हो और कोई हानि न हो वहां पॉजिटिव सोच रखना अपने लिए भी और दूसरे के लिए भी फायदेमंद होता है।
(सत्य घटनओं पर आधारित)
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ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी हुआ था पर जब हम कुबेरेश्वर धाम गए थे तब। हमारे पहुंचने से पहले वह रुद्राक्ष के चक्कर में भगदड़ मच गई थी। तो सब बोलने लगे वापस चलो वापस चलो वह जगह नहीं है और भगदड़ भी मच गई है पर दिल की आवाज़ सुनकर हम आगे बढ़ते गए और वहां पहुंच भी गए। रुद्राक्ष वितरण तो रोक दिया गया था उम्मीद नहीं थी कि मिलेगा हमें रुद्राक्ष। पर स्थिति ऐसी बनी कि हम भाई-बहन निकल गए महाकाल और ओंकारेश्वर के दर्शन के लिए। दर्शन बहुत अच्छे से हुआ और मम्मी पापा को रुद्राक्ष भी मिल गया।
असप अगर चाहें तो घटना का विस्तृत विवरण हमारे रीडर्स के लिए लिख सकती हैं। अगर वहां के फोटोग्राफ भेज सकें तो और बढ़िया! धन्यवाद!