(एक हास्य-व्यंग्य कथा)
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प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
कुत्ते अमीर-ग़रीब नहीं होते, इंसान की सोच होती है!
सारांश:
यह कहानी एक दिलचस्प व्यंग्य है जो अमीर और ग़रीब कुत्तों के रहन-सहन, सुविधाएं और जीवनशैली के फर्क को मज़ेदार अंदाज़ में सामने लाती है। सज्जनपुर के दो चायवाले रामदीन और चंदू की बातचीत के ज़रिए, कहानी हँसी के साथ एक गहरी सामाजिक सच्चाई को उजागर करती है। अंत में यह भावुक मोड़ पर पहुँचती है — जहाँ इंसानियत, रईसी और गरीबी से कहीं ऊपर साबित होती है। आइए आनंद लें इस मनोरंजक रचना का पूरे दिल से—
कुत्तों को इंसान का सबसे वफ़ादार दोस्त कहा जाता है, लेकिन अब यह दोस्ती भी अमीरी-ग़रीबी की लाइन से बँट चुकी है। एक तरफ़ अमीरों के कुत्ते हैं – जिनकी ज़िंदगी देखकर ग़रीबों के इंसानों तक को जलन हो जाए, और दूसरी ओर हैं ग़रीबों के कुत्ते – जो गली में घूम-घूमकर खुद ही तय नहीं कर पा रहे कि वो कुत्ते हैं या ग़रीबों की तरह बेरोज़गार।
सज्जनपुर की गलियों में एक दिन…
रामदीन और चंदू, मोहल्ले के दो पुराने चाय ठेलावाले, गली के नुक्कड़ पर बैठे ‘पॉलिटिक्स’ के साथ-साथ ‘पप्पू भैया के पालतू कुत्ते ब्रूनो’ की चर्चा कर रहे थे।
“अबे तूने देखा कल?” रामदीन ने चाय की प्याली थामते हुए कहा, “पप्पू भैया की कार में ब्रूनो बैठा था। एसी ऑन, ब्रूनो टिशू से मुंह पोंछ रहा था! और एक हम हैं, जिन्हें गर्मी में चप्पल भी चिपक जाती है।”
चंदू ने दुखी होते हुए सिर हिलाया, “भाई, हमारे मोती को तो रोटी के साथ अगर टमाटर की सब्जी भी दे दो, तो वो कसम खा लेता है कि आज से भूखा मरूंगा!”
कुत्तों का रहन-सहन
अमीरों के कुत्ते:
इनका रहन-सहन देखकर लगता है जैसे पेरिस फैशन वीक से उतरकर सीधे ग्रेटर कैलाश आ गए हों। सुबह-सुबह जॉगिंग नहीं, ‘पॉश वॉक’ करते हैं – वो भी एक लाख की बेल्ट वाली डॉग चैन से बंधे हुए। उनके पास स्पेशल ‘डॉग स्पा’ पैकेज होते हैं – जहां उनके नाखून तराशे जाते हैं, बालों की कंडीशनिंग होती है और शेप में रखा जाता है। कोई भी अमीर कुत्ता बिना “डॉग परफ्यूम” के बाहर नहीं निकलता, वरना उसे अपने क्लास का ‘शर्मिंदगी’ महसूस होती है।
ग़रीबों के कुत्ते:
उधर ग़रीबों के मोती, टाइगर, कालू, और सुलतान अपनी ज़िंदगी को गली-मोहल्ले में जीते हैं। न कोई चैन, न कोई टिशू। नहाना तो उनके लिए वैसा ही सपना है, जैसा इंसानों के लिए घर के सामने मॉल खुल जाना।
नाली में लोट-पोट करना ही इनका वीकेंड स्पा होता है। खाने के लिए कभी मंदिर का प्रसाद, कभी मुहल्ले के बच्चे की आधी खाई बिस्कुट, और कभी-कभी एक समय की रोटी – यही इनकी दावत है।
ट्रैवल और सोशल लाइफ
अमीरों के ब्रूनो की कहानी:
पप्पू भैया के ब्रूनो को स्पेशल सीट के साथ कार में घुमाया जाता है। कार के शीशे से बाहर झाँकते हुए वो अक्सर बगल वाले गरीब कुत्तों को ऐसी नज़रों से देखता है जैसे कह रहा हो – “तुम लोग इंसानियत के नाम पर धब्बा हो!”
वो हर महीने आउटिंग पर जाता है – कभी मनाली तो कभी गोवा। होटल में भी AC कमरा, और खाना ऑर्गेनिक! पप्पू भैया इंस्टाग्राम पर ब्रूनो की फोटो पोस्ट करते हैं – #MyBaby #FurKing #PetLuxury #DogLife
ग़रीबों के कालू की किस्मत:
ग़रीबों का कालू तो कभी-कभी गलती से किसी शादी में चला जाए तो समझो लॉटरी लग गई। एक प्लेट बची-खुची बिरयानी में से दो दाने मिल गए तो सोचता है – “आज तो खुदा मिल गया!”
कालू की इंस्टाग्राम नहीं होती, लेकिन मुहल्ले में उसकी ख्याति ज़रूर है – “अरे वही, जो हर बार मटका तोड़ देता है!”
सेहत और इलाज
अमीर कुत्ते:
अगर ब्रूनो को छींक भी आ जाए तो सीधा ‘वेटरनरी स्पेशलिस्ट’ से अपॉइंटमेंट। डॉक्टर का नाम नहीं, डॉक्टर का ब्रांड होता है। विटामिन की गोलियों से लेकर दांतों की सफाई तक, सब कुछ मेहंगे पैकेज में शामिल।
ग़रीब कुत्ते:
कालू को अगर जुकाम हो जाए, तो मोहल्ले की आंटी हल्दी वाला दूध बाहर रख देती हैं – पी ले तो ठीक, वरना भाग जाता है। एक बार मोती को लकड़ी लगी थी, तो बब्लू ने गोबर से पट्टी बांध दी थी – “दादी कहती थी गोबर से सब ठीक होता है।”
इमोशनल मोड़
एक दिन मुहल्ले में बिजली गुल हो गई। ब्रूनो के रूम का AC बंद हुआ, तो वो भौंक-भौंककर बौरिया गया। पप्पू भैया ने तुरंत जनरेटर ऑन करवाया। वहीं दूसरी ओर, बारिश में कांपते हुए कालू को देखकर रामदीन ने अपनी शर्ट का एक टुकड़ा फाड़कर उसे ओढ़ा दिया।
रामदीन की आंखों में चमक थी, “भले अमीर नहीं हूं, लेकिन मेरे पास दिल है।” कालू की आंखों से दो बूंद पानी टपका – शायद बारिश की बूँदें हों… शायद आंसू!
अंत में
हम सबका समाज एक जैसे कुत्तों को भी अमीर और ग़रीब बना देता है। लेकिन इंसानियत अब भी जिंदा है – न अमीरी में, न ग़रीबी में – बल्कि उस भाव में, जब कोई ग़रीब इंसान एक लाचार कुत्ते को देखकर रोटी का आखिरी टुकड़ा भी बाँट देता है।
कहानी का सार यह नहीं कि ब्रूनो ग़लत है या कालू महान, बल्कि यह कि इंसान बनो – चाहे तुम्हारा कुत्ता कहीं भी सोता हो!
“कुत्ते के वफ़ादार बनने से पहले इंसान को इंसान बनना चाहिए।”
अंत में रामदीन ने कहा — “कभी-कभी लगता है, अगर मैं ब्रूनो होता, तो शायद AC में सोता… लेकिन कालू के जैसा दोस्त मिलता?”
और दोनों ठहाके लगाकर हँस पड़े।
आपका क्या ख्याल है? आपके मोहल्ले में कौन सा कुत्ता सबसे मशहूर है — ब्रूनो या कालू? 😄
(काल्पनिक रचना)
2 Comments
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मेरे दीदी के घर भी कुत्ता है जिसका नाम भी ब्रूनो ही है। यह व्यंग्य वास्तविक चित्रण है ब्रूनो का और कालू का भी क्योंकि घर के पास वाले कुत्तों का भी वही हाल हैं जो व्यंग्य में बताया गया है।
मुझे तो गली वाले कुत्ते ज्यादा पसन्द हैं जैसे भोलू, लड्डू, निक्कू। ब्राउनी, बूजो और टाईगर जैसे बिल्कुल नहीं जो मेन गेट से बाहर गीदड़ बन जाते हैं।
बहुत अच्छी कहानी है ब्रूनो!