प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
हर लालच छोड़ता है एक सुराग… और हर कहानी का ब्लैंक पेज सच बोलता है।
सारांश:
दिल्ली की सर्द रात में मशहूर लेखक सुदीप सिंह की रहस्यमयी मौत ने सबको चौंका दिया। उनकी मेज़ पर रखा खाली पन्ना ही इस हत्या का सबसे बड़ा सुराग बना। ACP अजय राणा ने लालच और धोखे से बुनी इस साजिश का पर्दाफाशा करने में जी—जान से जुड़ जाता है। आगे क्या होता है, यह जानने के लिए थ्रिल और सस्पेंस से भरी इस स्टोरी को पढ़िए दिल थामकर…
दिल्ली की ठंडी रात में हल्की-हल्की धुंध फैली हुई थी। हवा में अजीब सी खामोशी थी, मानो किसी तूफ़ान से पहले की शांति हो। ग्रेटर कैलाश के पॉश इलाके में एक शानदार बंगले के अंदर, लाइट्स जल रही थीं। ये बंगला था देश के सबसे चर्चित क्राइम राइटर सुदीप सिंह का। उनकी कहानियों ने अपराध और सस्पेंस की दुनिया में तहलका मचा रखा था।
आज का दिन सुदीप के लिए बेहद खास था। उसने कुछ घंटे पहले ही सोशल मीडिया पर ऐलान किया था कि उसकी नई किताब—“ब्लैंक पेज”—लॉन्च के लिए तैयार है। उसने लिखा था:
“कल सुबह, एक ऐसी कहानी का पर्दाफाश होगा, जिसे पढ़कर हर किसी की रूह कांप उठेगी।”
लेकिन अगले ही दिन अखबारों की सुर्खियां थीं:
“मशहूर लेखक सुदीप सिंह की रहस्यमयी मौत”
सुबह नौकर ने दरवाज़ा खटखटाया, पर कोई जवाब नहीं मिला। दरवाज़ा अंदर से बंद था। खिड़की से झांककर देखा—सुदीप अपनी कुर्सी पर झुका पड़ा था, बिल्कुल निढाल। उसके सामने टेबल पर एक सफ़ेद कागज़ रखा था—खाली, बिल्कुल खाली।
पुलिस को कॉल किया गया। कुछ ही देर में ACP अजय राणा वहाँ पहुँच गए। लम्बा कद, कड़क निगाहें और चेहरे पर वही सख्ती, जो सालों के क्राइम सॉल्विंग से आती है। उन्होंने कमरे में कदम रखा और चारों तरफ नज़र दौड़ाई।
टेबल पर फैली किताबें, बिखरे पन्ने, दीवार पर लगे बेस्टसेलर पोस्टर्स… लेकिन अजय की नज़र उसी सफेद पन्ने पर अटक गई।
“एक मशहूर राइटर की मौत… और सामने बस एक ब्लैंक पेज?” अजय ने बड़बड़ाते हुए पन्ना उठाया।
पास खड़ी एक महिला रोते हुए बोली, “ACP साहब… मैं रिया मेहरा हूँ। पब्लिशिंग हाउस से। सुदीप सर की एडिटर।” उसकी आँखों में डर और दुख दोनों थे।
अजय ने उसकी तरफ देखा।
“कल रात आपने इन्हें कब आखिरी बार देखा?”
रिया ने धीरे से कहा, “कल शाम छह बजे। वो खुश थे, कह रहे थे कि कहानी पूरी होने वाली है। उन्होंने बस इतना कहा—‘कल सब खत्म हो जाएगा।’ और… और आज ये…”
अजय ने कमरे का बारीकी से निरीक्षण किया। जबरन घुसने का कोई निशान नहीं था। ना ही कोई संघर्ष के संकेत। लेकिन मोबाइल और लैपटॉप गायब थे। उन्होंने तुरंत टीम को आदेश दिया:
“पूरे बंगले की तलाशी लो। और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट जल्दी चाहिए।”
कुछ घंटों बाद रिपोर्ट आई—सुदीप की मौत जहर से हुई थी। टाइम ऑफ डेथ: रात 11 से 1 बजे के बीच।
अजय ने पब्लिशिंग हाउस के सभी करीबी लोगों को ऑफिस में बुलाया। बड़े कॉन्फ्रेंस हॉल में सन्नाटा था। अजय की आवाज गूंजी:
“सवाल सीधा है—कल रात सुदीप से आखिरी बार किसने बात की?”
(क्रमश:)
One Comment
Comments are closed.
I love it! Suspense-thriller writer ko hi maar diya.