प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
हर लालच छोड़ता है एक सुराग… और हर कहानी का ब्लैंक पेज सच बोलता है।
सारांश:
दिल्ली की सर्द रात में मशहूर लेखक सुदीप सिंह की रहस्यमयी मौत ने सबको चौंका दिया। उनकी मेज़ पर रखा खाली पन्ना ही इस हत्या का सबसे बड़ा सुराग बना। ACP अजय राणा ने लालच और धोखे से बुनी इस साजिश का पर्दाफाशा करने में जी—जान से जुड़ जाता है। आगे क्या होता है, यह जानने के लिए थ्रिल और सस्पेंस से भरी इस स्टोरी के आखिरी चैप्टर को पढ़िए दिल थामकर…
अजय की आवाज गूंजी:
“सवाल सीधा है—कल रात सुदीप से आखिरी बार किसने बात की?”
भीड़ में से एक नौजवान उठा—सुमित, एक जूनियर राइटर। उसने कहा, “सर, मैंने बात की थी। उन्होंने मुझे फोन किया था। बोले कि कहानी का एंड सोच लिया है। लेकिन ज्यादा कुछ नहीं बताया।”
अजय ने उसकी तरफ गहरी नज़र से देखा।
“तुमसे क्यों बात की? रिया एडिटर है, उससे क्यों नहीं?”
सुमित ने होंठ भींचते हुए कहा, “क्योंकि मैं उनका शिष्य था। वो मुझे गाइड करते थे।”
रिया ने बीच में कहा, “ACP साहब, सुदीप सर सीक्रेटिव थे। लेकिन एक बात उन्होंने मुझे भी कही थी—‘अगर मुझे कुछ हो जाए तो ब्लैंक पेज देखना।’”
अजय के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। उन्होंने धीरे से पन्ने को देखा और सोचा, “तो असली कहानी इसी में है।”
अजय ने पन्ने को लैब भेजा। UV लाइट में जो दिखा, उसने खेल ही बदल दिया। पन्ने पर इनविज़िबल इंक से लिखा था:
“कातिल यहीं है। शब्दों के लालच में। किताब मेरी, नाम उसका। – S”
अजय ने गहरी सांस ली। मतलब कातिल उसी का जानने वाला है। वजह—लालच। किताब चुराने का लालच।
जांच और तेज हुई। सुदीप का लैपटॉप डिजिटल फॉरेंसिक से अनलॉक हुआ। वहाँ दो कॉन्ट्रैक्ट्स मिले।
पहला कॉन्ट्रैक्ट—सुदीप और पब्लिशिंग हाउस के बीच, ब्लैंक पेज के नाम पर।
दूसरा कॉन्ट्रैक्ट—रिया और पब्लिशिंग हाउस के बीच, वही किताब—ब्लैंक पेज।
अजय ने रिया को बुलाया।
“रिया, ये डबल कॉन्ट्रैक्ट क्यों?”
रिया की आँखों में डर तैर गया। वो रोते हुए बोली,
“ACP साहब, मैं मजबूर थी। हाउस मुझे निकालने वाला था। मैंने सुदीप को मनाया कि किताब में मेरा नाम भी दे, लेकिन उसने साफ मना कर दिया। बोला कि ये उसकी क्रिएशन है। सर, मैंने उसे नहीं मारा…”
अजय उसकी आँखों में झांक रहे थे कि तभी सुमित हंस पड़ा। उसकी हंसी में एक अजीब सी ठंडक थी।
“ACP साहब, ये पब्लिशिंग की दुनिया है। यहाँ क्रिएटिविटी से ज्यादा क्रेडिट मायने रखता है।”
अजय ने गुस्से से कहा, “मतलब तू जानता है कि कातिल कौन है?”
सुमित ने मुस्कुराकर कहा,
“क्यों नहीं जानूंगा? सर, मैंने ही उसे मारा। क्योंकि उसने हमेशा मुझे नीचा दिखाया। कहता था—‘तू कॉपी कर सकता है, क्रिएट नहीं।’ अब ये किताब मेरे नाम होगी। मैं दुनिया का सबसे बड़ा लेखक बनूंगा।”
अजय ने ठंडी निगाहों से कहा,
“सुमित, तू भूल गया कि हर अपराध एक सुराग छोड़ता है। तूने भी छोड़ा—ब्लैंक पेज। तेरे लालच ने तेरी कलम तोड़ दी।”
सुमित चिल्लाया, “ACP, तूने सब बर्बाद कर दिया! मैं फेमस हो सकता था!”
अजय ने कहा,
“फेमस? तू तो सिर्फ़ जेल की कहानियों में फेमस होगा।”
सुमित को गिरफ्तार कर लिया गया। जाते-जाते अजय ने रिया से कहा,
“रिया, याद रखना—दुनिया गंदी नहीं होती, इंसान के इरादे गंदे होते हैं। कभी झूठ के पन्नों पर अपनी सच्चाई मत लिखना, वरना किताब अधूरी रह जाएगी।”
रिया ने आँसू पोंछे और मन में ठान लिया—अब वो सिर्फ़ मेहनत और ईमानदारी से काम करेगी।
उस रात ACP अजय राणा की डायरी में एक लाइन दर्ज हुई:
“लालच इंसान को इतना अंधा कर देता है कि वो अपनी कहानी खुद मिटा देता है। असली जीत ईमानदारी में है, वरना ज़िंदगी का आखिरी पन्ना हमेशा ब्लैंक रह जाता है।”
(काल्पनिक कहानी)
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Sumit ne apna apradh khudse q kabula?