लेखिका: शबनम मेहरोत्रा (कानपुर)
शब्दों में बसा प्रेम, दर्द और जीवन का गीत।
सारांश :
ये कविताएँ प्रेम, दर्द, विरह, और सामाजिक संदेश का सुंदर मिश्रण हैं। ‘गीत लिख दिया’ में प्रेम और भाईचारे का संदेश है, ‘नजर का तीर दिल के पार होता है’ रोमांटिक भावनाओं को दर्शाती है, जबकि ‘दिल में दर्द बहुत है’ जीवन की गहरी पीड़ा और साहस को उजागर करती है। ‘तुम प्रेम जो देते हो’ प्रेम की सच्चाई और रिश्तों की निष्ठा को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत करती है।
आइए पढ़िए शबनम की दिल को छूने वाली कविताएँ जिनमें प्रेम, दर्द, विरह और जीवन के गहरे भाव व्यक्त किए गए हैं –
गीत लिख दिया
तुम बोले तो गीत लिख दिया स्वर में तुम दोहरालो
जिन रागों में दिल तेरा चाहे उसमें ही तुम गा लो
प्रेम रसों में सराबोर है
है श्लेष कुछ ज्यादा
विरह में डूबे शब्द हैं इनके
हास्य का पुट है आधा
गा कर तो बतला नहीं सकती आकर आज लिखा लो
भाई भाई से कुछ गद्दारों ने
है यहाँ लड़वाया
सत्ता अपनी कायम रखने
ये प्रयास करवाया
आओ उनकी मंशा को मिल ठोकर सभी लगालो
प्रेम बाँट लो प्रेम मिलेगा
प्रेम ईश का रूप
क्यों नफरत को पैदा करने
तेज कर रहे धूप
मानों तो सब अपने शबनम सब को गले लगालो
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नजर का तीर दिल के पार होता है
शुरू जब किसी से प्यार होता है
नजर का तीर दिल के पार होता है
ये चाँद तारे और महताब होता है
उससे सुंदर मेरा दिलदार होता है
वक्त मिलने का जब होता उससे
कोई ही दोस्त या दम दीवार होता
राहतों चैन तसल्ली सब मिलता है
जिस घड़ी यार का दीदार होता है
हाले दिल क्या कहूँ शबनान बोलो
न मिलूं उनसे दिल बेजार होता है
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दिल में दर्द बहुत है
दिल में दर्द बहुत है लेकिन गीत हसी के गाती हूँ
झूठी हंसी से टूटे दिल को पल दो पल बहलाती हूँ
अपना दर्द सुनाऊँगी तो
झूठी श्रुति ही समझोगे
चाह रहा हूँ तुमसे लेना
सहानुभूति ही समझोगे
दर्द असह्य मैं सह कर भी ऊपर से मुस्काती हूँ
झूठी हंसी से टूटे दिल को पल दो पल बहलाती हूँ
जान लुटा दूँगी मैं तुम पर
कहना कितना सस्ता है
जब पैसे की बारी आती
ये सब पर ही महँगा है
इस लिए तो किसी के आगे हाथ कहाँ फैलाती हूँ
झूठी हंसी से टूटे दिल को पल पल बहलाती हूँ
कितना दर्द सहा करती हूँ
पूछ तो लेते तुम एक बार
खुल कर दर्द बताऊँ कैसे
तुम शायद न हो तैयार
तुम सुन लेते शायद ये शबनम शर्माती है
झूठी हसी से टूटे दिल को पल पल बहलाती हूँ
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तुम प्रेम जो देते हो
तुम प्रेम जो देते हो वह सत्य सरल देना ।
वरना इससे अच्छा निज हाथों गरल देना
कुछ कमियाँ भी हैं मुझमें,जो तुम समझ लेना
ये हाथ जो थाम लिया, स्वंभाव बदल देना ।
तेरे शब्द ही ऐसे थे जो, दिल में आन बसे ,
निज शहद में डूबे शब्द इसको न बदल देना
तुम सत्य से प्रण कर के,खटास तो मुझे देना
मेरा हाथ छुड़ा कर तुम,कहीं और न चल देना
मैं ओस की बूँद हूँ , कोमल भी क्षणिक भी हूँ,
मेरे बाद भी दोहराये मुझे , ऐसी ग़ज़ल दे देना
तेरे वाक्य विन्यासों ने,मरहम से ज़ख़्म भरा ,
“शबनम”को यही ख़ुशियाँ, अब तुम हर पल देना ।