लेखक: हेमन्त पटेल
शहर के शोर और दिल की खामोशी का अद्भुत संगम।
सारांश :
ये रचनाएँ शहर के शोर-शराबे, इंसानी तहज़ीब, और रिश्तों में समर्पण की भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं। इनमें प्रेम, आध्यात्मिकता, और जीवन की सच्चाइयों का गहरा चित्रण है। कविताएँ मानवीय भावनाओं, सवाल-जवाब से परे स्वीकार्यता और आंतरिक द्वंद्व को उजागर करती हैं।
आइए शहर के शोर, प्रेम, तहज़ीब और जीवन की सच्चाइयों को दर्शाती इन रचनाओं का आनंद लीजिए –
ये तेरा शहर शोर का गढ़ है
कोलाहल की ओढ़े चादर है
दिखने को तो ये सतरंग है, पर
यहाँ पौधों से ज़्यादा पतझड़ है
तहज़ीब
वो तहज़ीब से हुनर दिखाए अपने
मैं सलीक़े से मुल्तवी करता रहा
मेरा दिल बंदगी में था उसकी
वो चाक-ए-जिगर करता रहा
अर्थ –
चाक जिगर — हृदय को काटना, जिसका दिल टूट गया हो, दुःखित, हतोत्साह
चाक — फटा हुआ
मुल्तवी — स्थगित, टालना, रुकने वाला
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छंद
छंद जो चंद हैं, वो तुम्हें अर्पण हैं
तन मेरा, मन तेरा, भीतर द्वंद है
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सवाल—जवाब क्या करना?
हम जिसे पसंद करते हैं
उससे सवाल-जवाब नहीं करते
करते हैं— स्वीकार उसे
और उसे समर्पण कर देते हैं
लेना-देना तो व्यापार हो गया
इस फेर में संन्यासी-दरवेश नहीं पड़ते
यूॅं तो ख़्याल आता ही नहीं दरमियान
उसे देखकर सजदा हो जाता है
ख़ुदा क़सम किसी इरादे से नहीं करते