लेखिका: : शबनम मेहरोत्रा (कानपुर)
हर शेर एक एहसास, हर ग़ज़ल एक अनकही दास्ताँ है — शबनम की कलम से!
सारांश :
“कहाँ तक मुझे ले चले हो” — एक घायल प्रेमिका की वह शायरी, जो ठगी, छल और मधुर शब्दों के करिश्मे में उलझकर सवाल करती है कि प्रेम ने उसे कहाँ पहुँचा दिया।
“खामोश जुबां और दिल बेकरार है” — प्रेम की चुप्पी, बेचैनी, और आँखों की भाषा से संवाद करती यह रचना, इंतज़ार और मौन के गहरे रंगों से सजी है।
“रस की धार अनंत बहती थी” — एक अनुभवी जीवन का दार्शनिक चित्रण, जिसमें अतीत की मधुर स्मृतियाँ और वर्तमान की हकीकत का टकराव है।
“अपनी ये बेबाकियाँ कम कर दो” — रिश्तों में सुधार, खुद की गलतियों को स्वीकार कर नए सिरे से प्रेम पाने की एक आत्म-स्वीकृति से भरी ग़ज़ल।
“उफ्फ से चाँद अब ढलने लगा है” — एक श्रृंगारिक प्रेम ग़ज़ल जो चाँद, कली, भँवरे और दिल की आग के प्रतीकों से प्रेम की तीव्रता को दर्शाती है।
आइए प्रेम, पीड़ा, उम्मीद, स्मृतियाँ और आत्मीय संवाद की कोमल छवियों को दर्शाती इन कविताओं का आनंद लीजिए –
कहाँ तक मुझे ले चले हो (गजल)
कहाँ थी कहाँ तक मुझे ले चले हो
इतने भी क्या तुम दिल के भले हो
ये चेहरा पढ़ी तब समझ में ये आया
सचमुच में तुम तो दिल के जले हो
लगता है तुमसे ठगी न मैं ही केवल
बहुत सारे लोगों को पहले छले हो
है सचमुच करिश्मा कुछ बातों में तेरी
यूँ ही न खव्वाबों में सबके पले हो
जज्बात तेरे अब लिखती है शबनम
शब्द बनके वाक्यों में क्योंकर ढले हो
खामोश जुबां और दिल बेकरार है (गजल)
खामोश जुबां और दिल बेकरार है
बोलूँ किस तरह तुमसे ही प्यार है
अब आपके हाथों में चैनों करार है
मजबूर दिल आप पर ही निसार है
बीती ये रात और सुबह कब हो गई
आपकी ऑंखों में मगर अब खुमार है
मुस्कुराइए आप मेरे सामने बैठ कर
चेहरे पे देखता हूँ कितना निखार है
शबनम है दिल बात जो बोल दीजिए
किस बात को कहने में अब इंतजार है
रस की धार अनंत बहती थी (कविता)
रस की धार अनंत बहती थी
अंजुरी भर भर पीया हैं हमने
प्रेम प्रकाश के छाँव तले
जीवन मधुर जीया हमने
जीवन की अब साँझ हो गई
अब सोने की बारी है
कोई द्वार पर दस्तक देता
आँख भी उसकी भरी है
अपनापन और अधिकार से
घर में आन समाया है
मेरी आँख की बहती धारा
देख के वह भी रोया है
मधुर स्मृतियों मे खोई थी
वह यथार्थ दिखता है
बार बार अपने शब्दों से
वह मुझको समझता है
लगता है मैं भूल भी जाऊँ
पर अतीत तड़पाता है
वर्तमान में जीने को
वो मुझको उसकाता है
जब तक मौत नहीं आती है
यह जीवन तो जीना है
क्यों न दरिया पार करे हम
उसके हाथ सफ़ीना है
अब स्मृतियों संग मरना है
शबनम अब संग जीना है ।
अपनी ये बेबाकियाँ कम कर दो (गजल)
अपनी ये बेबाकियाँ कम कर दो
आज से ये कमियाँ कम कर दो
भूल बेवफा से प्यार करते रहना
दिल की मजबूरियाँ कम कर दो
दर्दे दिल का इलाज हो जाएगा जी
उनसे तुम ये दूरियाँ कम कर दो
लोग पहले सा इज्जत करेंगे तुम्हें
अपनी कारगुज़ारियाँ कम कर दो
लोग भी सच मानने लगेंगे तुम्हें
पहले ये लफ़्फ़ाज़ियाँ कम कर दो
तुम सदा ही सच बोलेगी शबनम
अंदर की भय तरियॉं कम कर दो
उफ्फ से चाँद अब ढलने लगा है (गजल)
उफ्फ से चाँद अब ढलने लगा है
जमीं पर दिन निकलने लगा है
तेरा दीदार जब से कर लिया मैंने
हसरते दिल में अब पलने लगी हैं
थक गए भँवरे ऐसा लगता है जैसे
कली पे धीरे धीरे चलने लगा है
हमारे प्यार की ताकत आजमाओ
तेरा पत्थर दिल पिघलने लगा है
शबनम न जी पाएगी तेरे बिना लेकिन
तुम्हारे साथ ये जी जलने लगा है