1857 के स्वतंत्रता संग्राम की महिला स्वतंत्रता सेनानी
श्यामकांत देशपांडे, नागपुर
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को सौ वर्ष से भी अधिक समय बीत चुका है। आज 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हम उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। इस सूची में अनेक ऐसे वीर और वीरांगनाएँ भी शामिल हैं, जिनके नाम इतिहास के पन्नों में कहीं खो गए।
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी तात्या टोपे को हम प्रतिवर्ष श्रद्धापूर्वक याद करते हैं। उनके नाम पर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के एक प्रमुख क्षेत्र का नाम तात्या टोपे नगर रखा गया, जिसे आज सामान्यतः टी.टी. नगर के नाम से जाना जाता है।
ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध लड़ा गया 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक विशाल भू-भाग में फैल गया था। इसका आरंभ 10 मई 1857 को मेरठ से हुआ, जब भारतीय सिपाहियों ने अपने अंग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस संघर्ष में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहब पेशवा और कुँवर सिंह जैसे अनेक महान योद्धाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अवध की बेगम हजरत महल सहित अनेक महिलाओं ने भी इस संघर्ष में सक्रिय भागीदारी निभाई।
यद्यपि यह संघर्ष अंततः सफल नहीं हो सका, लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव पड़ा। 1858 में अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया। इसके बाद शासन-व्यवस्था में कई परिवर्तन किए गए, लेकिन भारतीयों पर अंग्रेजों के अत्याचार समाप्त नहीं हुए।
इस स्वतंत्रता संग्राम में समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने भाग लिया। किसानों से लेकर सैनिकों और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों तक ने देशप्रेम और त्याग की भावना से इस संघर्ष में योगदान दिया। लेकिन अजीजन बाई इन सभी से एक अलग पृष्ठभूमि से आई थीं। वह उस समय कानपुर की प्रसिद्ध गायिका और नर्तकी थीं। अपनी सखी उमराव महल के साथ वह अपने महल में आने-जाने वाले लोगों का स्वागत करती थीं। बड़े-बड़े नवाब, अंग्रेज अधिकारी और उनके उच्च पदस्थ कर्मचारी उनके नृत्य और गायन के प्रशंसक थे।
लेकिन अजीजन बाई के हृदय में देशप्रेम की प्रबल भावना थी। उन्होंने अपने नृत्य और गायन से प्राप्त धन का उपयोग अंग्रेजी सेना के विरुद्ध संघर्ष कर रहे स्वतंत्रता सेनानियों की सहायता के लिए किया। उन्होंने तलवारें, बंदूकें और महिला सैनिकों के लिए पुरुषों की वर्दियाँ तक खरीदीं। वह स्वयं अपनी महिला साथियों की टुकड़ी का नेतृत्व करती थीं।
अजीजन बाई ने अंग्रेजी सेना के विरुद्ध संघर्ष में हर संभव उपाय अपनाया। उन्होंने अपने धन से स्वतंत्रता सेनानियों की सहायता की, जिससे कानपुर को अंग्रेजों के कब्जे से मुक्त कराने के प्रयासों में महत्वपूर्ण मदद मिली। रात में वह नर्तकी और गायिका के रूप में दिखाई देती थीं, जबकि दिन में सैनिक की वर्दी में रहती थीं। इसी कारण अंग्रेजी सेना लंबे समय तक उनकी वास्तविक भूमिका को पहचान नहीं पाई।
अजीजन बाई अपने महल में आने वाले अंग्रेज अधिकारियों से महत्वपूर्ण सैन्य सूचनाएँ प्राप्त करती थीं और उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों तक पहुँचाती थीं। इस प्रकार वह प्रत्यक्ष युद्ध के साथ-साथ गुप्त रूप से भी स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दे रही थीं।
उस समय अंग्रेजी सेना को आदेश था कि विद्रोहियों और स्वतंत्रता सेनानियों को देखते ही गिरफ्तार किया जाए या मार दिया जाए। संघर्ष किसी नियमित युद्ध की तरह नहीं, बल्कि जंगलों, शहरों और गलियों में लगातार चलता रहता था।
ऐसे ही एक संघर्ष के दौरान तात्या टोपे घायल अवस्था में कानपुर की गलियों से निकल रहे थे। उनके शरीर से बहुत रक्त बह रहा था और उन्हें अंग्रेजों की नजर से बचना भी आवश्यक था। किसी तरह वह अजीजन बाई के महल तक पहुँचे और दरवाजा खटखटाया। अजीजन बाई ने उन्हें तत्काल पहचान लिया…
क्रमश:
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