“जब संवेदनाएँ शब्द बनती हैं, तब कविता केवल पढ़ी नहीं जाती—समाज को जगाती भी है।”
✍️ कवि
भोला सागर, चन्द्रपुरा, बोकारो (झारखंड)
🌿 पर्यावरण बचा लो
हे महामानव!
खतरे में है आज
संपूर्ण पर्यावरण।
बचा लो
धरती, जल, जंगल,
नभमंडल और हवा
विनष्ट होने से।
बचा लो
प्रलय होने से
मानवता को,
संपूर्ण सृष्टि को।
समझो,
क्यों दिया है
हमें यह नेमत
कुदरत ने?
क्यों रची है
यह सृष्टि
कुदरत ने?
उत्थान का अर्थ
यह तो नहीं
कि सब कुछ
दाँव पर लगाकर
पतन का मार्ग
प्रशस्त किया जाए।
आज उत्थान और
पतन के बीच
लगी है होड़।
इंसान जिस रास्ते
कदम रख रहा है,
उसी रास्ते पर
खाई भी खोद रहा है।
मानवता का इसमें
कल्याण नहीं है।
रोज़ मानवता
अपाहिजों की तरह
तिल-तिल कर
मर रही है।
और हम हैं
कि इतिहास
रचने में लगे हैं।
मानवता बचे
या न बचे,
इससे बेख़बर हैं।
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❤️ सब्र का इम्तिहान
तेरे दर्शन की प्यासी हैं आँखें,
क्यों छलिया बन छलते हो?
और न तड़पा, दर्शन दे,
क्यों सब्र का इम्तिहान लेते हो?
तुम्हारे इंतज़ार में बिताया
है बेसब्री से हर पल।
मैंने कितना दर्द सहा,
रहता सुबह-शाम बेकल।
जुदाई का एहसास न हुआ,
तुझको गीत-ग़ज़ल बनाया।
दिल रो रहा था मगर,
सबके सामने हँसकर गाया।
खूब दर्द जब सताता है,
कागज़-कलम ले बैठ जाता हूँ।
सुनहरे पलों को याद कर,
कागज़ पर उसे उतारता हूँ।
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☀️ कुछ पल का कुहरा
मुसीबत आई है तो चली जाएगी,
समझ लो कुछ पल का कुहरा है।
दिखता है ज़रूर अंधियारा घना,
मगर हमेशा क्या यह ठहरा है?
डरना क्या है इस काली घटा से,
सूरज पर कब तक लगा पहरा है?
हाँ, मन को थोड़ा व्यथित करता,
इसलिए लगता अधिक गहरा है।
धूल उड़ती रोज़ ऊपर की ओर,
छिपा कब आसमां का चेहरा है?
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