जहाँ प्रार्थना में करुणा है, मौन में संवेदना है और समय में जीवन का शाश्वत सत्य।
चंद्रमती चतुर्वेदी, बस्ती, नियर अयोध्या धाम (यू पी)
प्रभु! जीवन सुखमय कर दो
अधिक न माँगूँ तुमसे प्रभु, बस इतनी-सी अरदास,
दूर करो उनके नयनों के आँसू, भर दो जीवन में उल्लास।
रोग-दोष सब दूर भगाकर, तन को निरोगी कर देना,
रोटी-कपड़े में चाहे कमी हो, पर साहस भर देना।
उनकी चिंता ने रैन चुराई, दिन का चैन भी खोया,
सुन लो प्रभु यह विनती मेरी, तेरी शरण ही संजोया।
यदि संभव हो जीवन मेरा, उनके नाम लिख देना,
उनके मुख पर फिर मुस्कानों का, उजियारा भर देना।
जो सद्पथ के राही बनकर, जग को राह दिखाते हैं,
अपने हिस्से के सुख त्यागकर, सबके दुःख हर जाते हैं।
ऐसे निर्मल मन वालों पर, अपनी कृपा बरसा देना,
टूटी आशा की हर डोरी, फिर से दृढ़ बना देना।
जिनके मन में लोभ न कोई, कपट न जिनके भीतर,
सेवा जिनकी पूजा बनती, प्रेम बसता जिनके अंतर।
उनके तन की पीड़ा हर लेना, मन में शांति भर देना,
सूनी पड़ी हुई बगिया में, फिर से फूल खिला देना।
जिनकी वाणी सत्य सदा हो, जिनके कर्म पवित्र हों,
जिनके कारण घर-आँगन के, सब कोने भी चित्र हों।
उनकी साँसों में बल भर दो, थकन सभी हर लेना,
जीवन-नैया डगमगाए तो, स्वयं पतवार बन जाना।
मैं तो दीन पुकारूँ तुमको, बस इतनी सौगात मिले,
उनके चरणों की सेवा का, मुझको पावन साथ मिले।
दर्द अगर लिखना ही चाहो, मुझको सारा दे देना,
उनके जीवन में प्रभु केवल, सुख का सागर भर देना।
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मौन की नदी
मौन-सा जीवन हमारा, मौन हम तो हो गए,
दर्द की गहरी नदी में, डूबकर भी सो गए।
शब्द थे जो पास अपने, होंठ तक आते नहीं,
घाव इतने मन में उतरे, अब किसी से कहते नहीं।
आँखों की सूनी दहकन में, अश्रु भी पत्थर हुए,
स्वप्न के सब रंग फीके, दिन भी जैसे मर गए।
मौन-सा जीवन हमारा…
चोट जब अपनों ने दी तो, शोर करना भूल गए,
भीड़ में रहते हुए भी, साथ चलना भूल गए।
मन की टूटी वीणा के, तार सारे खो गए,
गीत जो थे जन्म भर के, जाने कहाँ सब खो गए।
मौन-सा जीवन हमारा…
वक्त बदलेगा कभी तो, यह भरोसा जीवित है,
रात कितनी भी घनी हो, भोर होना निश्चित है।
एक दिन फिर मुस्कराकर, बोलना हम सीख लेंगे,
सूखे उपवन में नए सपनों के, फूल फिर से सींच देंगे।
मौन-सा जीवन हमारा, मौन हम तो हो गए,
दर्द की गहरी नदी में, डूबकर भी सो गए।
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वक्त का व्यवहार
जो कभी पल भर न रुकता, वक्त का व्यवहार है,
आज खुशियों का सवेरा, कल दुखों की मार है।
चक्र इसका चल रहा है, रुक न पाया द्वार पर,
राजसिंहासन झुका देता, तोड़ देता अहंकार।
फूल जो कल तक खिला था, आज वह मुरझा गया,
जो कभी पल भर न रुकता, वक्त का व्यवहार है।
धूप-छाया साथ लेकर, राह पर चलता सदा,
हार में भी सीख देता, जीत का देता पता।
जो समझ ले चाल इसकी, जीवन उसका सार है,
जो कभी पल भर न रुकता, वक्त का व्यवहार है।
जिसे देखा आज हँसते, कल वही लाचार है,
कल जहाँ उत्सव सजा था, आज सूना द्वार है।
राजा जाने कब तलक है, सिर पर उसके ताज यह,
वक्त आते देर क्या है, रंक भी बन जाए वह।
फूल की खुशबू भी केवल, कुछ समय की बात है,
क्षण बदलते ही यहाँ पर, बदल जाता साथ है।
धूप देकर यह जगाता, छाँव देकर थामता,
गिर पड़े जो राह में, उनको फिर से थामता।
हारकर अँधियारों में भी, जीत का संचार है,
जो कभी पल भर न रुकता, वक्त का व्यवहार है।
जो समझ पाया इशारा, वह कभी हारा नहीं,
दर्द पीकर भी मुसाफ़िर, छोड़कर पथ भागा नहीं।
चल निरंतर कर्म-पथ पर, यही जीवन का सार है,
जो कभी पल भर न रुकता, वक्त का व्यवहार है।
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