“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
अनामिका का छिपा हुआ अतीत
बरामदे में कुछ क्षण पहले तक फैला सन्नाटा अब बेचैनी में बदल चुका था।
ज़मीन पर गिरा पानी धीरे-धीरे मिट्टी में समा रहा था, लेकिन आदित्य के मन में उठी आशंकाएँ अब बाढ़ का रूप ले चुकी थीं।
उसके हाथ में अब भी वह पुरानी तस्वीर थी।
और सामने…
अनामिका घर के भीतर भाग चुकी थी।
यह पहली बार था जब उसने किसी साधारण-से प्रश्न पर अपनी पत्नी को इस तरह घबराते देखा था।
अब यह केवल संदेह नहीं रहा था।
उसके पास पहली बार एक प्रतिक्रिया थी… और प्रतिक्रियाएँ कभी झूठ नहीं बोलतीं।
आदित्य तेजी से घर के भीतर पहुँचा।
अनामिका अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर चुकी थी।
“अनामिका!”
उसने दरवाज़ा खटखटाया।
कोई उत्तर नहीं।
“दरवाज़ा खोलो।”
भीतर केवल धीमी सिसकियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
“मैं तुमसे लड़ना नहीं चाहता… सिर्फ़ सच जानना चाहता हूँ।”
कुछ पल बाद कुंडी खुली।
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
अनामिका की आँखें लाल थीं।
लगता था, वह कई मिनटों से लगातार रो रही थी।
“तुम्हें यह तस्वीर कहाँ मिली?”
उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
आदित्य ने उसकी आँखों में देखते हुए उत्तर दिया—
“पहले तुम बताओ… यह लड़की कौन है?”
अनामिका ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
उसने तस्वीर को अपने सीने से लगा लिया।
फिर आँखें बंद कर लीं।
“मैं…”
वह कुछ कहना चाहती थी।
लेकिन अगले ही पल चुप हो गई।
उसने तस्वीर वापस आदित्य के हाथ में रख दी।
“मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती।”
“क्यों?”
“क्योंकि…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
“…कुछ अतीत ऐसे होते हैं जिन्हें दफ़न ही रहने देना चाहिए।”
आदित्य अब स्वयं पर नियंत्रण खोने लगा था।
“दफ़न?”
वह लगभग चिल्लाया।
“पंद्रह साल की शादी के बाद मुझे पता चलता है कि शायद तुम्हारा नाम ही कुछ और था… और तुम कह रही हो कि मैं सवाल भी न पूछूँ?”
“आदित्य…”
“क्या तुम नंदिनी हो?”
अनामिका की पलकें झुक गईं।
कमरे में गहरा मौन छा गया।
कुछ क्षण बाद उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—
“नहीं…”
आदित्य ने राहत की साँस लेने ही वाला था कि उसने आगे कहा—
“…लेकिन नंदिनी मेरे जीवन का वह हिस्सा है…
जिसे मैं कभी भूल नहीं सकी।”
आदित्य स्तब्ध रह गया।
“मतलब?”
अनामिका ने सिर हिला दिया।
“बस… अभी इतना ही।”
उसी समय बाहर से परी की आवाज़ आई—
“मम्मी…”
दोनों ने तुरंत अपने चेहरे सामान्य बनाने की कोशिश की।
परी दौड़ती हुई कमरे में आई।
उसके हाथ में स्कूल की ड्राइंग कॉपी थी।
“देखो मम्मी… मैंने फैमिली बनाई है।”
चित्र में तीन लोग हाथ पकड़े खड़े थे।
बीच में एक छोटा-सा घर था।
ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—
“मेरा सबसे प्यारा परिवार”
अनामिका मुस्करा तो दी…
लेकिन उसकी आँखों से आँसू फिर बह निकले।
परी घबरा गई।
“मम्मी… आप रो क्यों रही हो?”
अनामिका ने बेटी को गले लगा लिया।
“खुशी के आँसू हैं, बेटा।”
आदित्य ने पहली बार महसूस किया…
उन दोनों के बीच खड़ी यह मासूम बच्ची उस तूफ़ान से बिल्कुल अनजान थी जो उसके घर को धीरे-धीरे निगल रहा था।
उस रात लगभग डेढ़ बजे।
आदित्य की आँख अचानक खुल गई।
बगल का बिस्तर खाली था।
अनामिका कमरे में नहीं थी।
उसने घड़ी देखी।
रात के 1:32 बज रहे थे।
वह धीरे से उठा।
पूरे घर में अँधेरा था।
तभी उसे नीचे से धीमी आवाज़ सुनाई दी।
कोई बात कर रहा था।
वह बिना आवाज़ किए सीढ़ियाँ उतरने लगा।
बैठक के पास पहुँचकर उसने देखा—
अनामिका खिड़की के पास खड़ी मोबाइल पर बात कर रही थी।
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
लेकिन रात की ख़ामोशी में कुछ शब्द साफ़ सुनाई दे रहे थे।
“…नहीं…”
“…उसे कुछ पता चल गया है…”
“…मैं अब और झूठ नहीं बोल सकती…”
आदित्य का दिल धड़कने लगा।
कुछ क्षण बाद दूसरी ओर से शायद कोई तेज़ आवाज़ आई।
अनामिका घबरा गई।
“नहीं!”
उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा—
“मैं पुलिस के पास नहीं जाऊँगी…”
यह सुनते ही आदित्य जैसे पत्थर का हो गया।
पुलिस?
किस बात की पुलिस?
फोन कट गया।
अनामिका ने चारों ओर देखा।
आदित्य तुरंत सीढ़ियों के पीछे छिप गया।
कुछ सेकंड बाद वह वापस कमरे में चली गई।
अगली सुबह आदित्य ने तय कर लिया—
अब वह केवल अनुमान नहीं लगाएगा।
उसे प्रमाण चाहिए।
वह सीधे अपने पुराने मित्र राघव के पास पहुँचा।
राघव साइबर क्राइम शाखा में कार्यरत था।
कॉलेज के दिनों से दोनों अच्छे मित्र थे।
राघव ने आदित्य को देखते ही पूछा—
“इतनी सुबह? सब ठीक तो है?”
आदित्य ने इधर-उधर देखकर दरवाज़ा बंद किया।
“मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।”
“किस मामले में?”
आदित्य कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“मुझे… मेरी पत्नी के बारे में जानकारी चाहिए।”
राघव ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
“क्या मतलब?”
आदित्य ने तस्वीर मेज़ पर रख दी।
“इस लड़की का रिकॉर्ड निकालो।”
राघव ने तस्वीर हाथ में ली।
जैसे ही उसने तस्वीर पलटी…
उसका चेहरा अचानक बदल गया।
उसने तुरंत तस्वीर वापस मेज़ पर रख दी।
“यह तस्वीर तुम्हें कहाँ मिली?”
“क्यों?”
राघव कुछ क्षण चुप रहा।
फिर धीरे से बोला—
“आदित्य…
मैं इस मामले में तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।”
“क्यों नहीं?”
राघव ने गहरी साँस ली।
“क्योंकि…”
उसने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और धीमी आवाज़ में कहा—
“यह मामला आज भी सरकारी रिकॉर्ड में ‘सीलबंद‘ (Classified) है।”
आदित्य की धड़कनें रुक-सी गईं।
“एक बार…”
राघव ने काँपती आवाज़ में कहा—
“…मैंने भी इस फ़ाइल को खोलने की कोशिश की थी।”
“फिर?”
राघव की आँखों में भय उतर आया।
“अगले ही दिन…
मेरे वरिष्ठ अधिकारी ने मुझे बिना कारण छह महीने के लिए दूसरे ज़िले में ट्रांसफर कर दिया था।”
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
अब पहली बार आदित्य को महसूस हुआ…
यह रहस्य केवल उसकी पत्नी के अतीत का नहीं था।
इसमें कोई ऐसी ताकत शामिल थी… जो सरकारी रिकॉर्ड तक दबा सकती थी।
और शायद…
यही ताकत अब उसके परिवार के चारों ओर अपना जाल बुन रही थी।
(क्रमश:)
No Comment! Be the first one.