“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
नंदिनी कौन थी?
मोबाइल की स्क्रीन धीरे-धीरे बुझ गई, लेकिन उस रहस्यमयी आवाज़ के शब्द आदित्य के भीतर गूँजते रहे—
“अब अगला सवाल यह पूछो… कि तुम्हारी पत्नी वास्तव में है कौन?”
उसने काँपते हाथों से पुरानी तस्वीर को फिर देखा।
तस्वीर में मुस्कराती हुई वह किशोरी सचमुच अनामिका जैसी ही दिख रही थी—वही बड़ी-बड़ी आँखें, वही मासूम मुस्कान, वही चेहरे की बनावट।
लेकिन तस्वीर के पीछे लिखा नाम…
“नंदिनी”
आदित्य का दिमाग सुन्न पड़ चुका था।
“क्या अनामिका ने अपना नाम बदल लिया था?”
“या फिर… वह कोई और है?”
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किस पर विश्वास करे—अपनी आँखों पर, तस्वीर पर, या उस अज्ञात व्यक्ति की बातों पर।
उसने तुरंत तस्वीर की फोटो अपने मोबाइल में खींची और घर लौट आया।
पूरे रास्ते उसका ध्यान सड़क पर कम और तस्वीर पर अधिक था।
शाम तक वह सामान्य बनने की कोशिश करता रहा।
जब अनामिका रसोई में रात का भोजन बना रही थी, आदित्य चुपचाप बैठक में बैठा उसे देखता रहा।
आज वह पहली बार अपनी पत्नी को एक पति की तरह नहीं…
बल्कि एक संदिग्ध व्यक्ति की तरह देख रहा था।
अनामिका ने मुस्कराकर पूछा—
“क्या बात है? आज बहुत शांत हो।”
“थोड़ा सिर दर्द है।”
“मैं दवा लाती हूँ।”
“ज़रूरत नहीं।”
अनामिका उसके पास आई और उसके माथे पर हाथ रख दिया।
“बुखार तो नहीं है…”
उसका स्पर्श हमेशा की तरह स्नेह से भरा था।
लेकिन आदित्य के मन में अब एक ही प्रश्न घूम रहा था—
“अगर यह स्त्री मुझसे कोई बड़ा सच छिपा रही है… तो क्या इसका यह प्यार भी झूठ है?”
रात लगभग ग्यारह बजे।
घर में सब सो चुके थे।
आदित्य अपने स्टडी रूम में बैठा था।
उसने लैपटॉप खोला और तस्वीर को स्कैन करके फेस रिकग्निशन सॉफ़्टवेयर में डाला।
वह वर्षों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित इमेज प्रोसेसिंग पर काम करता आया था।
उसे विश्वास था कि इंटरनेट कभी-कभी वह बता देता है, जो इंसान नहीं बता पाते।
कुछ मिनट बाद स्क्रीन पर परिणाम आया।
No Exact Match Found.
उसने दूसरा तरीका अपनाया।
तस्वीर के पीछे लिखे नाम के आधार पर खोज शुरू की—
“नंदिनी भोपाल”
सैकड़ों परिणाम आए।
लेकिन कोई भी उस तस्वीर से मेल नहीं खाता था।
फिर उसने एक और शब्द जोड़ा—
“नंदिनी गुमशुदा”
इस बार स्क्रीन पर एक पुरानी अख़बार की कतरन दिखाई दी।
समाचार लगभग बीस वर्ष पुराना था।
शीर्षक पढ़ते ही उसका दिल धड़क उठा—
“बारह वर्षीय बालिका रहस्यमय परिस्थितियों में लापता।”
समाचार अधूरा था।
ऑनलाइन रिकॉर्ड में केवल शीर्षक और तारीख उपलब्ध थी।
पूरा समाचार उपलब्ध नहीं था।
लेकिन नाम…
नंदिनी।
आदित्य देर तक स्क्रीन को देखता रह गया।
अगली सुबह वह बिना किसी को बताए शहर के केंद्रीय पुस्तकालय पहुँच गया।
वहाँ वर्षों पुराने अख़बारों का अभिलेखागार सुरक्षित रखा जाता था।
एक बुज़ुर्ग पुस्तकालयाध्यक्ष ने उसकी सहायता की।
करीब आधे घंटे की खोज के बाद धूल से भरी एक मोटी फ़ाइल उसके सामने रख दी गई।
“साल 2004 के अख़बार हैं।”
आदित्य ने तेजी से पन्ने पलटने शुरू किए।
अचानक उसकी उँगलियाँ रुक गईं।
वही समाचार।
इस बार पूरा।
उसने पढ़ना शुरू किया—
“शहर के प्रोफेसर शैलेन्द्र मिश्रा की बारह वर्षीय पुत्री नंदिनी मिश्रा रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गई है। पुलिस ने अपहरण की आशंका से जाँच शुरू कर दी है। परिवार ने सूचना देने वाले को पाँच लाख रुपये इनाम देने की घोषणा की है…”
आदित्य की आँखें तेजी से नीचे दौड़ीं।
समाचार के साथ एक छोटी-सी धुँधली तस्वीर भी छपी थी।
वही चेहरा…
वही मुस्कान…
जिसे वह कल उस पुराने मकान में देख चुका था।
उसके हाथ काँपने लगे।
लेकिन असली झटका अभी बाकी था।
समाचार के नीचे एक छोटी-सी टिप्पणी छपी थी—
“पुलिस सूत्रों के अनुसार, इस मामले का संबंध दो वर्ष पहले हुई एक अन्य रहस्यमय घटना से भी हो सकता है। हालाँकि अधिकारियों ने इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।”
दो वर्ष पहले?
कौन-सी घटना?
आदित्य ने पूरा अभिलेख खंगाल डाला।
लेकिन उस टिप्पणी का आगे कहीं कोई उल्लेख नहीं मिला।
ऐसा लगा…
मानो किसी ने जानबूझकर उस मामले को हमेशा के लिए दबा दिया हो।
घर लौटते समय उसके मन में केवल एक ही विचार था—
उसे अनामिका से सच पूछना होगा।
लेकिन कैसे?
अगर वह सचमुच नंदिनी है…
तो उसने अपना नाम क्यों बदला?
और यदि वह नंदिनी नहीं है…
तो वह तस्वीर उसके पास कैसे पहुँची?
उस रात भोजन के बाद अनामिका बरामदे में पौधों में पानी दे रही थी।
आदित्य उसके पास पहुँचा।
कुछ क्षण दोनों चुप रहे।
फिर उसने धीमे स्वर में पूछा—
“क्या मैं तुमसे एक सवाल पूछ सकता हूँ?”
अनामिका मुस्कराई।
“इतनी गंभीर भूमिका क्यों बाँध रहे हो? पूछो।”
आदित्य ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“क्या तुम्हारा नाम हमेशा से… अनामिका था?”
एक पल…
बस एक पल के लिए…
अनामिका का चेहरा बिल्कुल सफेद पड़ गया।
उसके हाथ से पानी का कैन छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
पानी मिट्टी में फैल गया।
दोनों की आँखें एक-दूसरे पर टिकी थीं।
कुछ सेकंड बाद अनामिका ने खुद को संभाला।
“तुम… यह सवाल क्यों पूछ रहे हो?”
आदित्य ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसने जेब से वह पुरानी तस्वीर निकाली…
और बिना कुछ बोले उसके सामने रख दी।
तस्वीर देखते ही अनामिका के चेहरे से जैसे सारा रक्त उतर गया।
उसकी आँखें फैल गईं।
होंठ काँपने लगे।
वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।
फिर उसके मुँह से केवल एक शब्द निकला—
“न… नहीं…”
अगले ही क्षण वह मुड़ी…
और तेज़ी से घर के भीतर भाग गई।
आदित्य स्तब्ध खड़ा रह गया।
अब उसे पहली बार यकीन हो गया था—
यह तस्वीर केवल एक पुरानी याद नहीं थी…
यह अनामिका के जीवन का वह राज़ था, जिसे वह हर कीमत पर छिपाए रखना चाहती थी।
और शायद…
यही राज़ आगे चलकर एक हत्या की वजह बनने वाला था।
(क्रमश:)
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