“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…बंद मकान का रहस्य
सड़क पर खड़ा आदित्य उस जर्जर मकान को अविश्वास से देखे जा रहा था।
कुछ ही मिनट पहले उसने अपनी आँखों से अनामिका को इसी घर के भीतर जाते देखा था। वह लगभग बीस मिनट तक अंदर रही थी और फिर बाहर निकलकर ऐसे चली गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
लेकिन चौकीदार के शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह गूँज रहे थे—
“इस मकान में पिछले दो साल से कोई नहीं रहता।”
आदित्य ने एक बार फिर लोहे के पुराने गेट को देखा। उस पर जंग की मोटी परत जमी हुई थी। खिड़कियों के शीशों पर धूल इतनी थी कि भीतर झाँकना असंभव था।
यदि सचमुच यह घर वीरान था…
तो अनामिका अंदर किससे मिलने गई थी?
“बाबा…”
आदित्य ने चौकीदार के पास जाकर पूछा।
“आप यहाँ कब से काम कर रहे हैं?”
बूढ़े ने अपनी लाठी सँभालते हुए उत्तर दिया—
“लगभग आठ साल से।”
“तो क्या आपने आज किसी महिला को इस घर में जाते हुए नहीं देखा?”
चौकीदार ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“नहीं बेटा।”
“अभी… पाँच मिनट पहले…”
“मैं तो यहीं बैठा था। कोई नहीं आया।”
आदित्य के भीतर सिहरन दौड़ गई।
“यह कैसे हो सकता है? मैं अपनी आँखों से देखकर आया हूँ…”
उसने बिना कुछ कहे जेब से पाँच सौ रुपये निकाले और चौकीदार की ओर बढ़ा दिए।
“अगर याद आए कि यहाँ कौन आता-जाता है… तो मुझे बता देना।”
बूढ़े ने पैसे लेने से इनकार कर दिया।
“बेटा… झूठ बोलकर पेट नहीं पालता मैं। इस घर में सचमुच कोई नहीं रहता।”
आदित्य अब खुद को रोक नहीं पाया।
उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई।
गली सुनसान थी।
उसने गेट को हल्का-सा धक्का दिया।
चर्र…
एक लंबी आवाज़ हुई।
गेट खुल गया।
“अगर कोई नहीं रहता… तो ताला कहाँ गया?”
वह धीरे-धीरे भीतर बढ़ा।
आँगन में सूखे पत्तों का ढेर जमा था।
बीच में एक पुराना नीम का पेड़ था, जिसकी टेढ़ी शाखाएँ मकान की दीवारों से टकरा रही थीं।
हवा चलती तो ऐसा लगता, मानो कोई धीमे-धीमे फुसफुसा रहा हो।
मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था।
आदित्य का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई और भीतर प्रवेश कर गया।
कमरे में धूल की मोटी परत जमी थी।
पुराना फर्नीचर सफेद चादरों से ढका हुआ था।
दीवारों पर मकड़ियों के जाले लटक रहे थे।
सब कुछ वर्षों से बंद पड़ा दिखाई देता था।
लेकिन तभी…
उसकी नज़र फ़र्श पर पड़ी।
धूल के बीच साफ़-साफ़ जूतों के निशान बने हुए थे।
और वे निशान…
अभी-अभी बने लग रहे थे।
आदित्य झुककर उन्हें देखने लगा।
दो अलग-अलग पैरों के निशान।
एक पुरुष के…
दूसरे महिला के।
महिला के सैंडल के निशान बिल्कुल वैसे ही थे, जैसे अनामिका अक्सर पहनती थी।
उसका गला सूख गया।
“तो मैं गलत नहीं था…”
वह उन निशानों का पीछा करने लगा।
वे सीधे भीतर वाले कमरे तक जा रहे थे।
कमरे के भीतर पहुँचते ही उसकी नज़र एक लकड़ी की मेज़ पर पड़ी।
मेज़ पर धूल नहीं थी।
मानो उसे अभी-अभी साफ़ किया गया हो।
उस पर एक पुराना हारमोनियम रखा था।
बिल्कुल वही मॉडल…
जैसा अनामिका के स्कूल में था।
उसके पास एक बंद लिफ़ाफ़ा रखा था।
उस पर केवल एक शब्द लिखा था—
“अनामिका”
आदित्य की साँसें तेज़ हो गईं।
उसने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा उठाया।
लेकिन खोलने ही वाला था कि…
ऊपर की मंज़िल से किसी भारी वस्तु के गिरने की आवाज़ आई।
धड़ाम…!
पूरा मकान गूँज उठा।
आदित्य का हाथ वहीं रुक गया।
उसने टॉर्च ऊपर की सीढ़ियों की ओर घुमाई।
अँधेरा।
पूर्ण सन्नाटा।
लेकिन उसे साफ़ महसूस हुआ…
ऊपर कोई है।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
हर कदम पर लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमरातीं।
हवा अचानक ठंडी हो गई थी।
ऊपर पहुँचकर उसने चारों ओर टॉर्च घुमाई।
चार कमरे थे।
तीनों बंद।
चौथे का दरवाज़ा आधा खुला हुआ।
अंदर से किसी के धीरे-धीरे चलने जैसी आवाज़ आ रही थी।
आदित्य ने हिम्मत जुटाई।
उसने दरवाज़े को धक्का दिया।
कमरा खाली था।
टूटी हुई कुर्सी।
पुरानी अलमारी।
फर्श पर बिखरे कुछ कागज़।
और…
खुली हुई खिड़की।
हवा के कारण पर्दा हिल रहा था।
“क्या सचमुच यहाँ कोई था?”
वह खिड़की तक पहुँचा।
नीचे गली दिखाई दे रही थी।
उसी समय…
उसे लगा जैसे नीचे कोई तेज़ी से भागा हो।
वह दौड़कर बाहर निकला।
लेकिन जब तक नीचे पहुँचा…
गली फिर सुनसान हो चुकी थी।
वह वापस उसी कमरे में लौटा।
इस बार उसकी नज़र अलमारी के पीछे पड़ी एक छोटी-सी वस्तु पर गई।
एक पुरानी तस्वीर।
उसने उसे उठाया।
तस्वीर में तीन लोग थे।
एक वृद्ध दंपति…
और उनके बीच लगभग दस-ग्यारह वर्ष की एक लड़की।
आदित्य का दिल जैसे रुक गया।
वह लड़की…
हूबहू अनामिका जैसी दिख रही थी।
लेकिन तस्वीर के पीछे जो लिखा था, उसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
“मेरी प्यारी बेटी नंदिनी के बारहवें जन्मदिन पर।
– माँ और पापा”
आदित्य स्तब्ध रह गया।
नंदिनी?
लेकिन…
उसकी पत्नी का नाम तो अनामिका वर्मा था।
फिर यह नंदिनी कौन थी?
और वह बिल्कुल अनामिका जैसी क्यों दिख रही थी?
उसके दिमाग़ में प्रश्नों का विस्फोट हो चुका था।
तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल बज उठा।
स्क्रीन पर फिर वही शब्द चमक रहे थे—
Unknown Caller
इस बार आदित्य ने बिना देर किए कॉल रिसीव की।
दूसरी ओर से धीमी, ठंडी और रहस्यमयी आवाज़ आई—
“तुमने तस्वीर देख ली…”
आदित्य की आवाज़ काँप उठी।
“तुम हो कौन?”
कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
फिर वह आवाज़ बोली—
“अब अगला सवाल यह पूछो… कि तुम्हारी पत्नी वास्तव में है कौन?”
कॉल कट गया।
आदित्य के हाथ से तस्वीर लगभग छूट गई।
उसे पहली बार लगा…
शायद वह जिस स्त्री के साथ पंद्रह वर्षों से रह रहा है…
वह उसे उतना जानता ही नहीं था, जितना वह समझता था।
और यह रहस्य…
सिर्फ़ उसके वैवाहिक जीवन का नहीं…
किसी बहुत पुराने, बहुत गहरे अतीत का दरवाज़ा खोलने वाला था।
(क्रमश:)
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