“आँसू, ममता और उम्मीदों से सजी भावनाओं की अनुपम काव्य-यात्रा”
दर्द का समंदर
छोड़ दो आंसुओं को समंदर में अब,
अश्रु खारिल नयन के निकल जाने दो।।
भीगे पलकों का बोझ उतारो तो जरा,
दर्द की हर इक कहानी बदल जाने दो।।
सीप के भीतर मोती निखरता नहीं,
सीप से मोतियों को निकल जाने दो।।
अपने नयनों में सजल जल भरो,
पावन गंगा की जैसे बह जाने दो।।
रात काली सही पर सहर तो आयेगी,
घुप अंधेरे का सूरज पिघल जाने दो।।
टूटें सपने के टुकड़े बटोरो समेटो नहीं,
नयी उम्मीदों का आंचल संभल जाने दो।।
ज़ख्म गहरे सही पर भरो तो कभी,
वक्त के हाथों से मरहम लग जाने दो।।
जो गया लौटकर अब न आयेगा कभी,
उस ग़म को हवाओं में बह जाने दो।।
मन के आंगन में फिर से दिया बार दो,
हर अंधेरे को खुद से उजल जाने दो।।
छोड़ दो आंसुओं को समंदर में अब,
जिंदगी को नयी धुन में ढल जाने दो।।
–सीमा द्विवेदी ‘स्नेहिल’, रायबरेली, उत्तर प्रदेश
माँ की ममता
हँसी-खुशी का वो मंज़र, चीख-पुकार में बदल गया,
क्रूज जब नर्मदा में समाया, हाँ सारा देश दहल गया।
भयावह मौत का तांडव देख, किसकी आँखें न नम हुईं,
जिसमें एक शव ऐसा निकला, सबकी आत्मा विकल हुई।
शव था नन्हें बालक का, जो ममता के उर चिपका था,
माँ का प्यार ऐसा दिखा, जो सबका ध्यान खींचता था।
जननी तो जननी होती, सीने से लाल को लगाये रखी,
मरना उसको कुबूल हुआ, बाँहों में लाल को दबाये रखी।
ममता का सच्चा स्वरूप देख, कवि कविताएँ गढ़ने लगे,
ऐसी मार्मिक कविताओं को, पाठक चाव से पढ़ने लगे।
हमने तो सिर्फ मंज़र देखा, ममता की न तड़प देखी,
माँ नर्मदा में समा एक माँ, बेचारी कितनी होगी तड़पी?
सोचता हूँ तो कलेजा फटता, हाय कैसा मनहूस दिन था,
काल के गाल समाये दोनों, हादसा कितना भयानक था?
माँ-बेटा दोनों साथ-साथ, अनंत चिरनिद्रा में सो गये,
हा-हा करते बचे परिजन, छाती पीट-पीटकर रो रहे।
ममता की सच्ची मूरत थी, देख लो दुनिया की माँओं,
यही जननी का फर्ज है, देखो त्यागने वाली माँओं।
-भोला सागर, चन्द्रपुरा, बोकारो, झारखंड
माँ का प्यार
माँ माँ माँ अपने संग गई लेके अपना प्यार,
तेरे बच्चे तरसे यहाँ तेरा पाने नेह-दुलार।
अपने प्यार से वंचित करके स्वर्ग के झूले झूले,
लेकिन लगता वहाँ भी अपने बच्चों को न भूले।
ममता वाला रूप लिए तुम आओ ना एक बार,
तेरे बच्चे तरसे यहाँ तेरा पाने नेह-दुलार।
एक दिवस तक माते तेरा भूली न उपदेश,
अपने घरों को हमने रखा तुमसा ही परिवेश।
अपने बच्चों को दिया है तेरा ही संस्कार,
तेरे बच्चे तरसे यहाँ तेरा पाने नेह-दुलार।
भरे नयन से तुम्हें पुकारूँ, आओ न एक बार,
तेरी याद में बहते हैं आँसू, पोंछो न जलधार।
शबनम की सुन लो माते मेरी करूँ पुकार,
तेरे बच्चे तरसे यहाँ पाने नेह-दुलार।
-शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
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