“कुछ मोहब्बतें मुकम्मल नहीं होतीं, फिर भी पूरी ज़िंदगी का सहारा बन जाती हैं।”
आश हम्द, पटना (बिहार)
…“ तुम आ गए बेटा ! मैंने आज तुम्हारे लिए कहवा बनाया है, रात को तुम्हारा गला ख़राब था ना !”
गुलशन ने कहवा से भरी ग्लास एजाज को पकड़ाई और ख़ुद अपनी चाय लेकर मालाएं, गजरे बनाने बैठ गईं ।
“ शुकिया अम्मी, लेकिन मुझे चाय भी चाहिए ।”
वह कहवा पकड़ते हुए बोला ।
“ हाँ बेटा, तुम पी लेना चाय भी ।”
“ समीरा…ओ..समीरा..ज़रा भाई के लिए एक कप चाय बना कर ले आओ !”
उसकी अम्मी ने ऊँची आवाज़ में समीरा ऑर्डर दिया ।
समीरा चाय ले आई तो वो पीकर काम के लिए निकल गया ।
झील पर पहुँचकर शिकारे को सजा-संवार कर वो बेइरादा ही उस अनजान लड़की का इंतज़ार करने लगा । ग्यारह बजते-बजते पर्यटकों की भीड़ बढ़ने लगी फिर एजाज अपने काम में व्यस्त हो गया । फिर शाम से पहले उसे होश नहीं आया । शाम हुई तो उसने सारी बत्तियां रौशन कर दी । अब भीड़ बहुत कम हो गई थी । इक्का-दुक्का लोग ही अब नज़र आ रहे थे शिकारों वालों के अलावा । फिर सारे अपने-अपने घरों की ओर चल पड़े, लेकिन पता नहीं वो क्यों बैठा इंतज़ार ही कर रहा था । तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा, उसने पलट कर देखा तो सामने उसका दोस्त टीपू खड़ा था ।
“ एजाज ! अब तक क्यों बैठा है यार ? तेरे अब्बा भी चले गए और बाकी लोग भी, तुझे नहीं जाना है क्या घर ?”
“ हाँ..हाँ.. यार जा ही रहा था… चलो साथ चलते हैं ।”
एजाज ने कहा और घर लौट आया । फिर कई दिन बीत गए लेकिन वो दोबारा नज़र नहीं आई । टीपू को उसने बताया तो वह खूब हँसा –
“ पागल ! तुम बिल्कुल पागल हो गए हो.. वो टूरिस्ट थी । घूमने आई थी चली गई । वो तेरे लिए थोड़ी आई थी.. ऐसे तो हमें रोज़ कई लोग मिलते हैं लेकिन उनके साथ चंद लम्हों का होता है । उन लोगों को ज़िन्दगी मान लेना तो हमारी ग़लती हुई ना ? हमारी बेवकूफी है । ऐसा करो तुम उस दिन के बारे में सोचना बंद कर दो क्योंकि कोई फ़ायदा नहीं है ख़ुद को जलाने से समझे मेरे दोस्त ?”
“ हाँ यार, समझ गया.. चल घर चलते हैं ।” फिर यूं ही कई सारे दिन गुज़र गए, बजाहिर एजाज अपने काम में बहुत व्यस्त रहता, लेकिन पता नहीं क्यों वो उस लड़की को भूल नहीं पा रहा था । रह-रहकर वो याद आती रहती इसलिए वो ज़्यादातर व्यस्त रहने की कोशिश करता ।
एक दिन वह ग्राहक के साथ खड़ा बात कर रहा था कि, किसी ने उसे पीछे से पुकारा ।
क्रमश: